प्रस्तुत गीत ‘इंसान का स्वभाव’(Lyric on ‘Human Nature’ in Hindi) व्यक्ति की प्रकृति एवं गिरते मानवीय मूल्यों पर लिखा गया है|
मैं एक काल्पनिक नायक/नायिका के माध्यम से इस गीत को लिखित रुप में पेश कर रहा हूँ| इंसान के विभिन्न नकारात्मक आचार, विचार, व्यवहार तथा इस आधार पर उसके कृत्यों को संक्षेप में गीत के रुप में पिरोने की ये मेरी एक कोशिश भर है| यहाँ प्रकृति के साथ भी व्यक्ति के स्वभाव को चित्रित किया गया है|
इस गीत के कई शब्द या वाक्यांश ऐसे हैं जिसके अर्थ सामान्य प्रतीत होंगे| हालांकि उसके वास्तविक अर्थ काफ़ी कुछ अलग भी हैं| ऐसे शब्द उपमा देने के लिए भी लिखे गये हैं| अतः सभी पाठकों से ये मेरा आग्रह है कि इस गीत को गाते/पढ़ते समय उपर्युक्त बातों का ध्यान रखें|
गीत – ‘इंसान का स्वभाव’ (Lyric on ‘Human Nature’ in Hindi)
{ टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|}-2
हवा का रुख भला कैसे समझे कोई,
लोगों की तरह ये बदलने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|
{ ग़ौर से देखो तुम इन जीवों को|
विश्वास हो रहा नहीं मुझको|}-2
दूजे की ख़ातिर जान देने वाले,
इंसान को ज़िन्दा अब ये खाने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|
{ धरती की फ़ित्रत यहाँ पर है,
देती ये सदा नहीं है लेती|}-2
बदल नहीं सकता आदत कुदरत|
पर लोगों के हाथों घुट जाने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|
Image by Chris LeBoutillier from Pixabay
{ इंसान न सोंचा था वो हो रहा है|
अपनी पूरी गरिमा वो खो रहा है| }-2
है कैसा समय ये ज्ञान से परे,
लोग सभी अच्छे टूट जाने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|
{ मेहनत पहले थी सफलता की कुंजी|
प्रेम, भरोसा था जीवन की पूंजी|}-2
सब-कुछ लुटाने की चाहत थी तब ,
{ अब अपने अपनों से लुट जाने लगे हैं |
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{ टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|}-2
हवा का रुख भला कैसे समझे कोई,
लोगों की तरह ये बदलने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं|
टूटे पंख हंसों के मिलने लगे हैं|
कौवे भी हंसों जैसे चलने लगे हैं||
--—कृष्ण कुमार कैवल्य-----
Lyric on ‘Human Nature’ in Hindi / ‘इंसान का स्वभाव’ से जुड़े शब्दार्थ –
धरा – पृथ्वी, धरती
फ़ित्रत – आदत, स्वभाव
कुदरत – प्रकृति
परे – दूर
रुख़ – दिशा, चेहरा
ग़ौर – ध्यान
धन्यवाद्|🙏
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