Poem on Corona-Pandamic in Hindi / कोरोना काल का दर्द: एक मार्मिक कविता

 Poem on Corona-Pandamic in Hindi / कोरोना काल का दर्द: एक  मार्मिक कविता -  कोरोना महामारी एवं उसके पूरे विश्व  में मानव पर पड़ने वाले प्रभावों  पर लिखी  गयी रचना है| 

 द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद पहली बार ऐसी विकराल परिस्थिति संसार के सामने आई; जिसने पूरी दुनिया को ठप कर दिया था| भारत में कोरोना (COVID-19) की शुरुआत 30 जनवरी, 2020 को केरल से हुई थी।

 भारत में इसकी मुख्य समयसीमा इस प्रकार रही:

​शुरुआत: 30 जनवरी, 2020 (पहला मामला केरल के त्रिशूर में मिला)।

​देशव्यापी लॉकडाउन: 25 मार्च, 2020 से शुरू हुआ।

​प्रमुख लहरें: * पहली लहर: सितंबर 2020 में चरम (Peak) पर थी।

​दूसरी लहर (डेल्टा): अप्रैल-मई, 2021 में सबसे घातक रही।

​तीसरी लहर (ओमिक्रोन): जनवरी,  2022 के आसपास आई। और धीरे-धीरे घटती चली गयी|

 विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 5 मई, 2023 को आधिकारिक तौर पर इसे वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल की श्रेणी से बाहर कर दिया| हालांकि वायरस अब भी एक सामान्य बीमारी के रूप में मौजूद है। इससे घबराने की बिलकुल भी ज़रूरत नहीं हैं| 

 कोरोना और इंसान के बीच के  जंग पर आधारित प्रस्तुत है मेरी ये संवेदनशील, विचारपरक  कविता –




Image by Gerd Altmann from Pixabay


कोरोना और हम

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वुहान शहर से फैला कोरोना,
विकराल था इसका वेश|
पूरी धरा को नापा इसने,
शेष रहे कुछ देश|


कर इंसान का देह नियंत्रण,
किया ये अपना पोषण|
जैसे विकसित कुछ देश हैं करते,
कमजोर देशों का शोषण|


छुपा रहा मानव के अन्दर,
तब दवा नहीं था इसका|
रहना पड़ा था घर के अन्दर
बचाव ही राह था जिसका|


कोरोना प्रभाव के कारण

 पड़े थे ठप सभी देश|
लोगों की जान बचाने हेतु
दिए गए थे कुछ आदेश -


"रहो घर में बाहर न जाओ,
करो बंद गृहेतर काज|
कोरोना सबके खून का प्यासा,
नहीं इसका है ईलाज|"


मंदिर-मस्जिद सब बंद पड़े,
ईलाज का भार था जिस पर|
वही उभरकर सामने आया,
बन सशक्त था वो डॉक्टर|


राजा-रंक थे इसकी जद में,
चार्ल्स, जॉन्सन या कबाड़ी|
हद कर दी थी दुनिया में इसने,
पड़ गया था सब पे भारी|


हानि इतनी हुई थी जग में,
शव हेतु कंधे थे कम|
कब्रिस्तान में जगह न थी,
ये देख चुके थे हम|


रही ऐसी आगे भी बेहोशी तो
होश कभी न आएगा|
ऐसे छुपे बैरी के कारण
दुनिया से मानव जायेगा|


Image by Queven from Pixabay


कुदरत को उजाड़ने वालों की 
 बिलकुल बोलती बंद थी|
अंधी दौड़ के उन जीवों की
गति पड़ गयी मंद थी|


चूहे, चमगादड़, कुत्ते, बिल्ली
जैसे जीव न खाओ|
है भारत का ये सन्देश,
घर अच्छी चीज ही लाओ|


शत्रु है बलवान अगर तो
दो कदम पीछे हट जाओ|
और उपलब्ध सारे समय को
खुद की ताकत में लगाओ|


शक्ति अपार रही भारत की
कायम रखा था धीर|
दुर्गति हुई थी उन देशों की
जो थे नहीं गंभीर|


खून के आँसू रोए खूब,
यूएस, इटली, स्पेन|
घर के अन्दर रहकर इसके
तोड़ रहे थे चेन| 


 जैविक अस्त्र का कर प्रयोग,
होते हैं कुछ देश संतुष्ट|
अपने वित्त-पोषण से करते
कई संगठनों को पुष्ट|


 Image by Syaibatul Hamdi from Pixabay


 विश्व-युद्ध की तरह कोरोना ने, 
किया था दुनिया पे घात|
विकसित देश भी खूब खाए थे,
इस वायरस से मात|


जीवों की संरचना में आज भी, 
कुछ देश  बदलाव करते हैं|
वायरस बैंक बनाकर फिर
प्राण लोगों के हरते हैं|


हम दुखी तो अन्य सुखी क्यों?
 हो जाए जब ऐसे विचार|
ऐसे घाती मित्रों से
कैसे हो सदव्यवहार?


कोरोना कई सबक भी लाया,
लोगों ने कुछ इससे भी पाया|
इंसान को नहीं परवाह मूल्य की,
इसका मूल्य लेने था आया|


ऐसे भी दिन इसने थे दिखाए,
मदद केंद्र बना था थाना|
हाथ जोड़कर गीत भी गाए
और दिया था स्वच्छ- खाना|


पशु-पक्षी सड़कों पर थे आये,
नदियों में निर्मलता आई|
दूषित वायु के स्तर में
बहुत कमी हम सबने पाई|


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भागमभाग की दुनिया में तब
सबने कुछ स्थिरता पायी|
आत्म-चिंतन का मौका पाया,
महत्ता घर की समझ में आयी|


खूब चले थे लॉकडाउन, क्वौरंटीन,
आइसोलेशन जैसे शब्द|
न कभी कोरोना आए,
बने न ये प्रारब्ध|
बने न ये प्रारब्ध||

                     ***कृष्ण कुमार कैवल्य***.


 Poem on Corona-Pandamic in Hindi / कोरोना काल का दर्द: एक  मार्मिक कविता -

 से जुड़े शब्दार्थ –

  • गृहेतर – घर से बाहर
  • गाज – मुसीबत, आफ़त
  • प्रारब्ध – भाग्य के अर्थ में प्रयोग|


  • कुछ दिलचस्प जानकारी - कोरोना से तब खुद को बचाए रखने वाले देश थे  - तुर्कमेनिस्तान, नौरू, तुवालु, मिक्रोनेशिया|



नोट -

  • यह कविता  प्रारंभिक रूप से 28/04/2020 को प्रकाशित की गयी थी | चूँकि यह रचना  सामयिक थी| अतः मैंने इसे सर्वकालिक बनाने हेतु इसमें थोड़ा परिवर्तन करके वर्तमान में (17 फ़रवरी, 2026) नया रूप दिया है| समय, काल और पारिस्थिति के अनुसार बदलाव आवश्यक हो जाता है| आशा है यह  आपको पसंद आएगी|  धन्यवाद|

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