A Heart Touching Memoir on Life in Hindi: एक यादगार संस्मरण - "ये ज़िंदगी"

 A Heart Touching Memoir on Life in Hindi: एक यादगार संस्मरण - "ये ज़िंदगी" एक ऐसा संस्मरण है जो मानवीय संवेदना को शब्दों के माध्यम से काफ़ी गहराई तक ले जाती है|

 ज़िंदगी के समूचे विशिष्ट -ताने बाने को थोड़े शब्दों में नहीं उतारा जा सकता| ख़ासकर संस्मरण के मामले में| क्योंकि वक्त की धूल यादों को धुमिल कर देती है| फिर भी संस्मरण हमें कुछ ख़ास बीतें पलों में ले जाता है और बहुत कुछ एहसास करा जाता है|


 संस्मरण - ये ज़िंदगी

संभवत: यह बात 2016 या 17 की रही होगी; जब मैं पटना अपने एक रिश्तेदार के घर गया था। मैंने देखा विश्व का सबसे प्राचीनतम महानगरों में से एक पाटलिपुत्र यानी पटना धीरे-धीरे अपनी शांति खोती जा रही है व प्रचंड महानगरीय जीवन शैली की चादर ओढ़ती जा रही है। 10 साल बाद आज 2026 में तो यहाँ बहुत ज्यादा चकाचौंध नज़र आता है| ये रंग-रूप आगे भी ऐसे ही क्रमिक रूप से जारी रहेगा| देखा जाए तो समूचे देश में तक़रीबन कमोबेश यही परिदृश्य परिलक्षित होता है|

तेजी से विकास करना बहुत अच्छी बात है, परंतु यह विकास एकाकी नहीं सतत होना चाहिए। वरना आज तो देश में चारों तरफ वन की कीमत पर कंक्रीट के जंगल ही बनते जा रहे हैं। ये स्थिति अच्छी नहीं बल्कि भयावह होती जा रही है|



https://en.wikipedia.org/wiki/File:Patna_Junction_.jpg



बहरहाल मैं सतत विकास की यहां चर्चा नहीं कर रहा हूं। बल्कि एक ख़ास घटना का जिक्र करना चाहता हूं। दोपहर का समय था। मैं पटना जंक्शन से गुजरते हुए अशोक राजपथ पहुंच चुका था। बहुत ही चिलचिलाती धूप थी। पटना की गर्मी होती भी बहुत विशेष है। ऊपर से मई का आखिरी हफ्ता था। मैं काफी देर से घर से निकला हुआ था। दोपहर हो चुकी थी और मुझे भूख महसूस हो रही थी।

मैं इधर-उधर की चीजें बहुत कम खाता हूं। क्योंकि मुझे थोड़ी समस्या होने लगती है।  रोड के किनारे कुछ खाने की चीजें दिखीं जरूर, पर मन नहीं माना। मैं कुछ दूर आगे बढ़ा।

अब बिस्किट जैसी चीज के बारे में सोच ही रहा था। तभी मैंने देखा एक व्यक्ति शरीर से हट्टेकट्ठे, माथे पर पगड़ी, नीचे घुटनों तक धोती, ऊपर में कुर्ता जो करीब-करीब क्रीम कलर का था, पहने हुए थे। वे जीविकोपार्जन हेतु अपने सिर पर एक टोकरी में केला रखकर बेच रहे थे।

उनको देखकर मुझे बड़ी खुशी हुई। मैं जान गया कि मुझे फल खाने को अब मिल जाएगा। मैंने उन्हें रोका। वे एक लकड़ी के स्टैंड पर उस केले की टोकरी को रखकर पसीना पोंछते हुए बोले - कितना चाहिए बाबू?

मैंने पूछा - कैसे दे रहे हैं भईया?
तो आगे उन्होंने हिंदी मिली हुई भोजपुरी भाषा में मुझसे बातें कीं और कहा - बबुआ ₹30 में एक दर्जन।
मैं केले को देख ही रहा था कि उन्होंने कहा कि बबुआ! इ चिनिया केला ह। देखे में तो छोट-छोट बा, पर बहुत मीठा लागी।

मैंने बिना ज़्यादा सवाल किए एक दर्जन केले ले लिया और उन्हें पैसे दिए। फिर वहीं बगल में खड़ा होकर खाने लगा भूख इतनी जोर थी कि एक दर्जन केला कब ख़त्म हो गया पता ही नहीं चला। हालांकि वे केले बहुत छोटे अवश्यक थे, पर सच में बहुत ही मीठे थे। उन्हें खाने के बाद मुझे बहुत संतुष्टि हुई।

फिर उन स्वादिष्ट केलों को देखते हुए मैंने सोचा कि अपने रिश्तेदार के बच्चों के लिए भी ले लूं।
इसी बीच उन्होंने कहा बबुआ! लागत बा घर खातिर भी केला लेवे के बा।
मैंने कहा - हां दो बच्चे हैं। दो दर्जन दे दीजिए। मैंने केले ले लिये और वहीं बगल में एक पेड़ की छांव में बैठ गया। क्योंकि थोड़ी देर बैठने की इच्छा हो रही थी| केले वाले भैया भी वही बैठकर आराम करने लगे।

मैंने कहा कि भैया! कमाई ठीक-ठाक हो जाती है न।  मैंने कमाई कितनी होती है, यह नहीं पूछा। क्योंकि यह पूछना थोड़ा अच्छा नहीं लगता।

उन्होंने बड़े सरल स्वभाव से मेरे प्रश्न का जवाब दिया। कहा- बबुआ, बस जिंदगी चल रहल बा। एक-एक दिन राम भरोसे कटता। बस दू वखत के रोटी ऐसे मिल जाला, इहे बहुत बा।
आगे थोड़ा उदास होकर कहा- बाल-बच्चन के जिंदगी अच्छा से नईखे बन पावत।

फिर कुछ सेकंड रुक कर थोड़ा हंसते हुए उन्होंने कहाघर में मेहरारू भी बड़ी खिसियात रहेली। कहेली कि ई तनी मनी कमाई से जिनगी कइसे चली
ई कमाई के चलते तो कहीं जा भी ना पावेनी। ताना मार के कहेली कि नइहर गइला केतना साल हो गईल। लागता अब इहे घर से रंथी उठ जाई।

इतना कहने के बाद मेरी ओर देखकर उन्होंने कहा - पर हम चुपचाप पीठ गहिर करके सब सुनत रहेनी। काम के चलते हमहूं कहीं ना जा पावेनी|




बहुत लोग कहेला कि घर ठीक जगह पर नाही बनल बा| वास्तु दोष बा| तो कोई कुछ आउर टोना-टोटका के बात कहेला| ई सब बातन पर विश्वास ना भईला के कारण हम गूंगा, बहिरा, अंधा बनल रहेनी|

उनकी बड़े ही सहज और बेबाक वचनों को सुन कर मैंने कहा - घर में बच्चा लोग ठीक बा न|

यह सुनकर उन्होंने कहा - जब घर लौट के जानी त दूनों बच्चन बहुत खुश होके आवेला लोग| एक बेटा आ एक बेटी बा| हाई स्कूल में 9 और 11 क्लास में | उ सब के चेहरे देखके हम खुश हो जानी| कमाई कहियो कम रहेला तो कभी ठीक ठाक| कभी राशन ना रहला फिर भी बहुत खुशी-खुशी रात में भी केला हमनी खा के सो जानी| कम से कम भगवान के कृपा से उहो नसीब हो जाला; त उ कम नइखे|


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मैंने उनको देखा वे बड़े संतोष की मुद्रा में अपनी बातें कह रहे थे| उनकी ज़िंदगी की किताब में असंतोष में भी संतोष दिखा | लगभग नाम मात्र के पढ़े लिखे होने के बावज़ूद भी वे इतने सुलझे और साफ़ बोलने वाले इंसान होंगे; यह जानकार मुझे अपार ख़ुशी हुई| उनसे काफ़ी कुछ बातें मैंने की|

उनकी आर्थिक स्थिति पर मुझे दुःख हो रहा था| परन्तु मानो एक ही नाव की सवारी हमारी थी| इसलिए …….|

फिर चलते-चलते मैंने उनसे कहा - भईया, रउरा बहुत अच्छा इंसान बानी| रउरा से मिलके बहुत ख़ुशी भइल| फिर उनको प्रणाम करके मैं आगे बढ़ने लगा। मैंने देखा वे अपने दोनों हाथों को उठाकर मुझे आशीर्वाद दे रहे थे| उनका यह अंदाज मेरे हृदय के तरंगों में उछाल ला दिया और मैं भावुक हो गया|

मैं रास्ते में आगे बढ़ जरुर रहा था, पर उनकी बातें मेरे दिमाग में घूमती रही| उस वक्त मुझे चलते रहना ज्यादा अच्छा लग रहा था| कुछ देर चलने के बाद मैंने एक जगह किनारे बैठकर अपनी छोटी डायरी निकाली और बिना किसी की परवाह किये उनकी बातों को एक कविता के सांचे में ढालने लगा। उनके शब्द मेरे दिल को छू गए थे|| इसलिए मैं जिस काम के लिए निकला था; उसे उस दिन नहीं कर पाया| और एक छोटी सी भोजपुरी कविता लिख डाली| साथ में कुछ अन्य बातें भी| उस वक्त मैं ख़ुद को भूल गया और पन्नों में समा गया|


जो कविता उस दिन मैंने लिखी थी; वह इस प्रकार है - 


कविता - "ये ज़िंदगी!"


बहुत समय हो गईल हमार अब,
बेचत-बेचत ई चिनिया केला।
बहुत समय हो गईल हमार अब,
बेचत-बेचत ई चिनिया केला।
दू वखक्त के रोटी बा मुश्किल,
ज़िंदगी हो गईल बा खेला।

दस साल से दुभर बा नइहर,
आ चैन से रोटी खईला।
देवेली रोज मेहरारु ताना,
कहेली अभागा, कईला।

लेकिन रंग त हमार गोर बा,
देह बा बिल्कुल चईला।
बगल में मंदिर बा फिर भी,
उहां हमरा भइल ढेर दिन गईला।

एक जईसन सब समय लागेला,
का सबेर का सांझ बेला।
कर पीठ गहिर गारी सुनत रहेनी,
बहुत कुछ ई दुनिया देला।

बावज़ूद ग़रीबी के मार के,
ना हम कोई बाबा के चेला।
ओझा, गुनी, डायन, भूत,
ई सरफिरन के खेला।

बरदास ना होला मुफलिसी,
दिल में बा गांठ, ढेला।
पर बाल-बचन के पाके प्यार,
हम बेचत रहेनी केला।
बेचत रहेनी केला….।।
    - कृष्ण कुमार कैवल्य।


 A Heart Touching Memoir on Life in Hindi: एक यादगार संस्मरण - "ये ज़िंदगी" से संबंधित शब्दार्थ/भावार्थ - 


  • धूमिल       - धुंधला, अस्पष्ट,फीका, मलिन, मद्धम|
  • परिलक्षित     - स्पष्ट होना, दिखाई देना, झलकना, दृश्यमान होना|
  • बहरहाल      - येन-केन-प्रकारेण, कुछ भी हो, किसी न किसी प्रकार से (however, anyway)
  • जीविकोपार्जन  - जीविका चलाने का काम, जीवन यापन के लिए आवश्यक धन, आजीविका                   कमाना,
  • मेहरारू       - पत्नी, बीवी, भार्या|
  • नईहर        - माईका, पिता का घर (औरत के लिए)|
  • चईला        - कठोर, सख्त, मजबूत|
  • कईला        - कोयला जैसा, कालिमा लिए, कुछ ख़राब होने के अर्थ में|
  • मुफ़लिसी      - ग़रीबी, निर्धनता, दरिद्रता, कंगाली|


कुछ ख़ास बातें - 

माना कि ज़िंदगी पीछे मुड़कर देखने का नाम नहीं है; फिर भी कुछ यादें ऐसी होती हैं जो हमें अन्दर से बहुत कुछ सोचने पर मज़बूर कर देती हैं| मेरी ज़िन्दगी का यह एक ख़ास हिस्सा था; जिसे मैंने सदा के लिए इस ब्लॉग https://www.shabdsansar.com में सहेज कर रख दिया है| 

इस संस्मरण में लिखी गयी कविता इसका अभिन्न अंग है| इसलिए मैंने इसे यहाँ स्थान दिया| इसे आप कविता-संस्मरण भी कह सकते हैं| साथ ही यह संस्मरण भोजपुरी से भी सराबोर है| क्योंकि यही सच है| और मैंने सच को लिख दिया|

दोस्तों, यदि यह संस्मरण(Memoir) आपको पसंद आया हो तो अपने मित्रों/अपनों को भी अवश्य पढ़ायें| मुझे बहुत ख़ुशी होगी| एक ख़ास बात यह कि यदि आपके जीवन में भी कुछ अमिट यादें हों तो कमेंट में अवश्य शेयर करें| धन्यवाद| 🙏

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