Emotional Memoir in Hindi | 'दर्द और आत्मसंघर्ष का संस्मरण' - दिल को छू लेने वाला एक गंभीर संस्मरण है|
कई बार हम देखते हैं कि कुछ व्यक्ति जीवन में बड़े अकेले और अलग-थलग से रहने लगते हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं पारिवारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक, मानसिक और भौतिक कारण अधिक जिम्मेदार होते हैं।
दर्द और आत्मसंघर्ष का संस्मरण
आम आदमी आज इतना व्यस्त है कि दूसरे के जीवन को देख पाने का उसके पास समय नहीं है या अगर है भी तो देखना नहीं चाहता। क्योंकि अधिकांश व्यक्ति यह सोचते हैं कि मैं उस समय का उपयोग अपने लिए क्यों ना करूं; दूसरे के लिए क्यों सोचूं।
सोशल मीडिया के इस जमाने में तो लोगों ने दूसरे के लिए समय देना और भी मुश्किल कर रखा है क्योंकि वे वर्चुअल दुनिया में ही खुश हैं। इससे नकारात्मक प्रभाव बहुत अधिक सामने आ रहे हैं|
एक ही परिवार में माता-पिता, पति-पत्नी, बेटा-बेटी... मौजूद हैं। परन्तु कोई टीवी में व्यस्त है तो कोई मोबाइल में।
एक साथ खाना खाए बरसों हो गए। एक-दूसरे के दुःख-सुख, हाल-चाल अपने परिवार के लोग ही नहीं पूछते| माता-पिता अपने-अपने काम में व्यस्त हैं| बाल-बच्चों को पैसे तो वे दे रहे हैं पर उनको सही ज्ञान, संस्कार देने की उन्हें फुर्सत नहीं है। एक समय के बाद कुछ माता-पिता अगर समय देना भी चाहते हैं तो वे नहीं दे पाते| क्योंकि देरी हो चुकी होती है| वे उन्हें कुछ कहते हैं, ज्ञान देते हैं तो बच्चे लेना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें यह सब बेकार लगता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब जो काम करना चाहिए उसी समय करना चाहिए और जब जिसे जहां होना चाहिए, वही होना चाहिए। संस्कार का भी एक समय होता है (प्रधान रूप में जन्म से स्कूली शिक्षा तक)। यदि स्कूली जीवन अर्थात लगभग प्लस टू के बाद बच्चों को नैतिकता/संस्कारों की अगर शुरुआत की जाए तो यह करीब-करीब असंभव सा हो जाता है| क्योंकि घड़ा पक कर तैयार हो चुका होता है। और उसे फिर एक नया स्वरुप दे पाना मुश्किल हो जाता है।
कहा भी गया है -
गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ी-गढ़ी काढै खोट।
अंतर हाथ सहार दे, बाहर बाहे चोट।। (संत कबीर दास जी का दोहा)
अर्थात गुरु कुम्हार की तरह हैं और शिष्य कुंभ यानी घड़े की तरह है। जिस प्रकार कुम्हार अपने चक्र पर घड़ा बनाते समय घड़े को बाहर से चोट मारता है, उसकी अशुद्धियों व कमियों को निकालता है; परंतु अंदर से उसे सहलाता व सही आकार देता है| ताकि वह घड़ा एक अच्छा रूप ले सके।
ठीक उसी प्रकार गुरु भी शिष्य रूपी कुंभ को बाहर से थोड़ी चोट मारते हैं, अनुशासन व कठोर मार्गदर्शन में रखते हैं; जबकि अंदर से प्रेम, सम्मान, स्नेह, वात्सल्य, विवेक, ज्ञान आदि देकर उसे संतृप्त करते हैं और एक अच्छा इंसान व नागरिक बनाने का प्रयास करते हैं।
मैंने इस दोहे को इसलिए उद्धृत किया है क्योंकि प्रथम पाठशाला घर ही होता है और माता-पिता संयुक्त रूप से प्रथम गुरु| अधिकांश अभिभावक यह मान बैठे हैं कि उनके पास अपने बाल- बच्चों को संस्कार, सद्बुद्धि देने का समय नहीं है| परंतु वे सचमुच नहीं जानते कि ऐसा करके वे अपने बच्चों के साथ ही नहीं बल्कि अपने साथ भी अन्याय कर रहे हैं और इसका परिणाम पूरी ज़िंदगी न सिर्फ वह बच्चा या उसका परिवार बल्कि दूसरे भी भुगतते हैं।
उस बच्चे का सामाजिक सर्किल, सारा ताना-बाना डांवाडोल हो होता है| उसका आने वाला जीवन, उसकी सोच, रिश्ते सभी प्रभावित होते हैं।
प्रस्तुत संस्मरण में मैं अपने एक मित्र के बारे में कुछ बताना चाहता हूं। उनकी शिक्षा की व्यवस्था उनके माता-पिता द्वारा बहुत ही अच्छी तरह की गयी व उचित संस्कार दिए| बड़े ही अच्छी परवरिश भी हुई और बड़ा ही खुशहाल परिवार उनका रहा।
सामाजिक मूल्यों को समझना, इंसानियत पर विश्वास करना, जाति-धर्म आदि से ऊपर उठकर मानवता की अवधारणा पर चलने वाला परिवार कुछ इस प्रकार भीतर से टूटा कि टूटता चला गया।
कुछ विशेष कारणों से मैं ज्यादा वर्णन तो नहीं कर पा रहा हूं। क्योंकि निजता का उल्लंघन हो जाएगा, जो सर्वथा अनुचित है। परंतु उनके जीवन में कुछ घटनाएं ऐसी हुई जो अप्रत्याशित थीं|
कहा जाता है कि अगर शरीर में थोड़ी सी चोट लगे तो थोड़ा असर पड़ता है। चोट अगर लगती चली जाए तो फिर शरीर विकृत अथवा बदरंग हो जाता है। शरीर का दर्द भी व्यक्ति को तिल-तिल कर जीने को मजबूर कर देता है| इसलिए हम हर मामले में यह नहीं कह सकते कि शारीरिक पीड़ा मानसिक पीड़ा से कम होती है।
फिर भी शरीर का दर्द मानसिक दर्द से कमतर होता है। ऐसा हर हाल में तो नहीं पर आम तौर पर होता है। शरीर का घाव तो भर जाता है; परंतु मन का शायद कभी नहीं भरता। क्योंकि अपनों द्वारा दिया गया धोखा, विश्वास घात वह ब्लैक होल है जो कभी नहीं भरता और हर चीज को अपने में समेटते जाता है।
मेरे मित्र को भी उनकी अच्छाई, सच्चाई का कई लोगों ने नाजायज फायदा उठाया। लोगों ने उन्हें नादाँ समझते हुए उनकी अच्छाई का फायदा उठाया| परंतु वे लोगों की इसलिए मदद करते गए क्योंकि वे एक अच्छे इंसान हैं। यह जानते हुए भी कि सामने वाला उन्हें नासमझ समझ रहा है।
निःसंदेह वे एक अच्छे इंसान हैं। परंतु कुछ मामलों में जब तक वे समझते, उसके पहले कुछ अपनों ने हीं उनके साथ विश्वासघात किया।
यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि अपनों से मतलब यह नहीं होता कि जो एक परिवार से हों या खून का रिश्ता हो या वैवाहिक रिश्ता हो। अपनों में वे सभी लोग आ जाते हैं; जिन्हें हम दिल से अपना मानते हैं। और सहोदर अथवा वैवाहिक आदि रिश्ते होने के बावजूद भी जिन्हें हम दिल से दूर कर चुके होते हैं, वे अपने होकर भी अपने नहीं होते।
यही सोच मेरे मित्र का भी है। बहरहाल मैं 3 अगस्त, 2026 की घटना बताना चाहता हूं। यह एक ऐसा संस्मरण है जो काफी कुछ गहराई से सोचने को मजबूर कर देता है। उन्होंने मुझसे जो कुछ भी कहा, वह काफी विस्तृत चर्चा का विषय है। हम अलग-अलग मुद्दों पर आपस में चर्चा करते रहे हैं। और एक दूसरे के सुख-दुख में साथ रहे हैं।
वे कुछ सालों से अपने आप को काफी हद तक एकांत में रखते हुए खुद को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं। और मुझे इसमें खुशी भी है कि वह धीरे-धीरे सफल हो रहे हैं पर रेस अभी लंबा है। ऐसा मुझे लगता है वे जिस प्रकार के व्यक्ति हैं उस आधार पर मैं कह सकता हूं कि उन्हें किसी से दुश्मनी या खुन्नस नहीं है| क्योंकि वे बहुत ही विशाल हृदय वाले और ऊंचे ख्याल के व्यक्ति हैं।
परंतु उन्होंने कहा कि वह कुछ लोगों से जिनमें कुछ मित्र भी हैं, बातें नहीं करते। कई ऐसी बातें हैं, मुद्दे हैं, व्यक्तिगत विभिन्नताएं हैं, सामाजिक, आर्थिक सरोकार हैं, नैतिक मूल्य हैं, जिनके कारण वे उन चुनिन्दा लोगों से खामोश सा हो चले हैं।
उन्होंने एक मित्र के बारे में इतना भर बताया कि वो कभी कभार फोन करते हैं। कभी-कभार मैसेज करते हैं। लेकिन वे इनका उत्तर नहीं देते।
उन्होंने बताया कि 3 अगस्त, 2026 को एक मैसेज आया जिसमें लिखा हुआ था-
“ऐसी क्या बेरुखी हो गई है कि मेरा मित्र फोन नहीं उठा रहा है। न ही मैसेज का जवाब नहीं दे रहा है। कुछ खास बात है तो बतायें। आपका ये व्यवहार आश्चर्यचकित कर देने वाला लगता है। मैं चाहता हूं कि आप इस बार, एक बार अवश्य अपनी प्रतिक्रिया दें।
आपकी प्रतिक्रिया की आस में।
आपका मित्र -......
उन्होंने मुझसे कहा कि उस मैसेज को पढ़ने के बाद उन्हें उत्तर देना आवश्यक लगा। चूंकि वे मुझसे काफी कुछ खुलकर बातें करते हैं। इसलिए उन्होंने मुझे वह मैसेज भी दिखलाया।
वह पत्र/मैसेज सच में बड़ा ही गंभीर था। अलग-अलग सोच, प्रवृत्ति वाले लोगों को वह मैसेज पढ़कर अलग-अलग विचार आएंगे और एहसास भी अलग-अलग होगा। यह व्यक्ति की प्रवृत्ति, मनोवृति, वैचारिक गहराई आदि पर निर्भर करता है।
उस मैसेज/ पत्र का मजमून कुछ इस प्रकार था-
मित्र अजय (नाम बदला हुआ) नमस्कार,
आपने जो मैसेज लिखा है ……और अंत में आपने लिखा है कि कुछ बात है तो बतायें नहीं तो हम भी चुप लगा देंगे। तो मैं इस डर से नहीं लिख रहा हूं कि आप या कुछ अन्य लोग चुप लगा देंगे। परंतु आपने जानना चाहा, इसलिए मैं कुछ दिल के उद्गार लिख रहा हूं।
इस भौतिकवादी और चीखने, चिल्लाने वाली दुनिया में सांस्कृतिक व आध्यात्मिक नजरिया रखने वाले अधिकांश लोगों को चुप करा दिया जाता है। पर मैं उन लोगों में से नहीं हूं। यह आप भी जानते हैं। मैं एक निश्चित समय के बाद आपसे स्वयं बातें करता। परन्तु वह समय कब आएगा, मुझे नहीं मालूम।
6 महीने के बाद, 2 साल बाद या नहीं आएगा, ये मुझे नहीं मालूम। अब ये तो यह कुदरत या ईश्वर ही जानें। पर मुझे विश्वास है कि वह दिन ज़रूर आएगा जब मैं आपसे, कुछ अन्य दोस्तों और लोगों से बातें अवश्य करूँगा।
एक अटल सत्य है कि मैं जो था, वही हूं और मरते दम तक रहूंगा। 8 अरब 30 करोड़ की इस दुनिया में मैं जानता हूं कि मेरे जैसे कुछ 100 लोग भी शायद नहीं होंगे। दुर्भाग्य है कि बहुत कम लोग ही मुझे समझ पाए। इस बात का बहुत ज्यादा दर्द नहीं पर अफसोस ज़रूर होता है। हां यह मैं जरूर कहना चाहता हूं कि मैं कोई ख़ास आदमी नहीं हूं। बिल्कुल आम आदमी हूं। पर हूं करोड़ों लोगों से कुछ अलग।
समस्या यह है कि आज पूरे वैश्विक परिवार में ही माता, पिता भाई, बहन, बेटा, बेटी, पति, पत्नी… एक दूसरे को नहीं समझ पा रहे हैं और जो जो नहीं होना चाहिए वो सब हो रहा है। इससे बड़ी त्रासदी क्या है? कैसे समाज में हम जी रहे हैं।
मेरा प्रयास ज़रूर रहता है कि अपना परिवार और साथ ही दूसरों का परिवार भी सच में परिवार बना रहे। क्योंकि यह मुझे विरासत में मिला और इस माइने में दुनिया में सर्वाधिक भाग्यशाली लोगों में से मैं भी एक हूं कि मुझे ईश्वर जैसे माता-पिता मिले और उनका अच्छा संस्कार मिला। और मैंने भी अपना पुत्र-धर्म निभाने का 100% प्रयास किया। अब इसमें कितना सफल हो पाया, यह ईश्वर ही हिसाब करेगा।
अधिकांश इंसान अपनी नैतिकता, ईमानदारी, चरित्रबल सब कुछ खो चले हैं। समाज में वास्तविकता कुछ और एवं कहने को कुछ और हो चला है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे लोगों के लिए ये चीजें बेमानी हैं, सड़ी गली हैं। पर मेरे लिए हमेशा मायने रखती हैं।
इन कारणों से अधिकांश लोगों के सांचे में मैं फिट नहीं बैठता। और मैं जानता हूं कि मैं आज के दौर के लायक नहीं हूं। आज ऊपर वर्णित लोगों जैसा यदि मैं भी बन जाऊं तो मैं भी अमीर बन जाऊंगा व लोगों की नजरों में समझदार कहलाने लगूंगा। पर ऐसी अमीरी नहीं चाहिए और ऐसी समझदारी भी मुझे नहीं चाहिए।
व्यक्ति जीवन की गहराइयों में जाकर चीजों को नहीं देखता। जबकि मैं जन्म से इसके उलट रहा। साथ ही हमेशा कुछ अच्छा करने का जज्बा दिल में रहा और बचपन से करता भी आया हूं।
कई लोगों ने अंधेरे में मुझे रख कर मेरा फायदा भी उठाया। कुछ लोगों से धोखा, विश्वासघात भी मिला। लेकिन ऐसा करने के बावजूद मैं मजबूत बना। हां ऐसे लोगों ने मुझे हमेशा के लिए जरूर खो दिया।
चिंतनवादी प्रवृत्ति, सच्चाई, अच्छाई, ईमानदारी, बुद्ध, महावीर,चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, स्वामी विवेकानंद, भीमराव अंबेडकर, ईसा मसीह, गुरु नानक, कबीर, डॉक्टर कलाम, लाल बहादुर शास्त्री जी आदि की सीखें मेरे साथ हमेशा चलती हैं।
जीवन में इतने अधिक उतार-चढ़ाव और जलजला आए, जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। और अभी भी कुछ गंभीर चुनौतियां आ रही हैं।
अभी संघर्ष का दौर है। बहुत लोगों ने मुझसे मुंह मोड़ लिया। कुछ लोग मुझे समझ नहीं पाए। वहीं कुछ अन्य मुझ पर अपनी मर्जी थोपने के प्रयास किये। कई लोगों ने मुझे बहुत हीन दृष्टि से देखा।
लिखने को तो सारी दुनिया है। लेकिन शायद आप पढ़ते-पढ़ते बोर हो जाएंगे| इसलिए अब मैं ज्यादा लिखना नहीं चाहता।
ऐसा नहीं है कि आपने या आप जैसे कुछ लोगों ने मेरे साथ कोई गलती की है। पर मुझे लगता है कि बहुत सारी बातें हैं और अंतर हैं, जिसे अभी मैं पाट नहीं पा रहा हूं। और कुछ बातें मैं लिखना नहीं चाहता|
चिंतन, मनन, सोच, विचार की बहुत बड़ी खाई तो अधिकांश लोगों से है। परंतु कुछ अपवादों को छोड़कर सभी लोगों में संस्कृतिकता पर भौतिकता पूरी तरह हावी हो गई है।
परंतु मेरे लिए आज भी शांति, खुशी, प्रेम, आनंद, रिश्तों की पवित्रता जैसी चीजें सर्वोपरि हैं। जब काफी विपरीत परिस्थितियां चल रही हों तो बहुत धीरज और संयम से आगे बढ़ना पड़ता है। इनसे मैं उबर जाऊं, फिर उसी जोश, उत्साह, प्रेम, सम्मान से आपसे एवं कुछ अन्य लोगों से बातें अवश्य करूंगा और मिलूंगा। 

उक्त पत्र रुपी सन्देश को उन्होंने जब मुझे पढ़ाया तो उनके चेहरे पर गंभीर भाव थे|
उन्होंने कहा था कि कुछ लोगों ने उन्हें जीते जी मार दिया। इसलिए उन लोगों के लिए वे मर चुके हैं। कुछ वैसे ही विश्वासघातियों, फरेबियों के नाम चंद बातें उन्होंने उस समय कही। वे शब्द बड़े ही दर्द भरे थे। (उन्होंने मुझे यह भी कहा कि उनके वे गंभीर वाक्य उस मित्र के लिए कदापि नहीं; जिन्होंने उन्हें 3 अगस्त, 2026 को मैसेज किया था)।
उनकी उन बातों को मैंने एक छोटी सी शायरी रूप में रूपांतरित कर यहां प्रस्तुत किया है| ये शायरी दिल में उतर जाने वाली रचना है; जो इस प्रकार है-
बड़ी ही गलती की तुमने
बड़ी ही गलती की तुमने,
वह मिट्टी नहीं सोना था।
बड़ी ही गलती की तुमने,
वह मिट्टी नहीं सोना था।
मक्कारी के कारण तुझे,
उसे निश्चित ही खोना था।
थे तुम मगरूर, मौका-परस्त,
इसलिए यह तो होना था।
था तुम सबसे उसे बहुत प्रेम,
इसी बात का तो रोना था।
थे तुम्हारे दिल में खूनख्वार जोंक,
राह में उसके कांटे तो बोना था।
इंसानियत थी उसमें कूट-कूट कर,
रिश्तों को उसे मुकम्मल ढोना था।
उसकी अच्छाई को किया तार तार,
उसके खूं से खुद को धोना था।
पर उसके दिल में तुम सबके लिए,
बेहद प्यार भरा एक कोना था।
पर उसके दिल में तुम सबके लिए,
बेहद प्यार भरा एक कोना था।।
- कृष्ण कुमार कैवल्य|
Emotional Memoir in Hindi | 'दर्द और आत्मसंघर्ष का संस्मरण' से जुड़ें शब्दार्थ/भावार्थ -
* ब्लैक होल - एक खगोलीय पिंड होता है; जिसमें प्रकाश समेत कोई भी चीज एक बार अन्दर चला जाए तो वापस नहीं आ सकता|
* सांस्कृतिकता - यहाँ इस शब्द का उपयोग प्रेम, इंसानियत, करुणा, अच्छाई, सच्चाई आदि चीजों के लिए किया गया है|
* भौतिकता - पैसा, ताकत, ज़मीं, बाहरी दिखावा वाली चीजों के लिए इस शब्द का प्रयोग|
* खूनख्वार - खून पीने वाला|



2 टिप्पणियाँ
Gambhir sansmaran aur sansmaran se bhi adhik Gambhir shayari.
जवाब देंहटाएंPRATIKRIYA KE LIYE DHANYAWAD.
जवाब देंहटाएंदोस्तों,
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