An Untold Painful Shayari: "ज़िन्दा लाश!" ह्रदय को छू देने वाली दर्द भरी शायरी है|
इंसान कभी-कभी इतना टूट चुका होता है कि उसे ज़िंदगी से मोह भंग हो जाता है| अर्थात् उसे मौत की चाहत होने लगती है| जीवन में दर्द की हर सीमा पार हो जाने पर इस जहान से विरक्ति हो जाती है| इन्हीं पहलुओं को छूते हुए प्रस्तुत है शायरी - ज़िन्दा लाश!
शायरी - ज़िन्दा लाश !
{अपनों ने किये मुझ पे कुछ ऐसे रहम,
बस मौत की चाहत रह गई थी मुझे} -2
जब दरवाज़े पे हुई मौत की दस्तक,
मिली हद से अधिक ख़ुशी तब यार मुझे।
{क्योंकि थी बड़ी आस मुझे अपने ही मौत से,
ज़िंदगी ने तो यतीम बना दिया था मुझे}-2
किंतु ये क्या! मौत ने दी एक मुस्कान,
बस छूकर इसने मुकम्मल दगा दे दिया मुझे।
{फ़लसफ़ा भी ज़िंदगी का होता है अजीब,
बड़ा ही गहरा सबक ये सिखा दिया मुझे}-2
चाहा डूब कर जिऊं इस ज़िंदगी को बहुत ख़ूब,
पर इसने तो तैरती लाश बना दिया मुझे।
किस अनजाने जुर्म की सज़ा मिल रही मुझे?}-2
जी रहा हूं ज़िंदगी यारों है नहीं अब मौत,
वक्त किस मोड़ पे अब ले जाएगी मुझे?
वक्त किस मोड़ पे अब ले जाएगी मुझे?
- कृष्ण कुमार कैवल्य।
An Untold Painful Shayari: "ज़िन्दा लाश!" से संबंधित शब्दार्थ/भावार्थ -
नोट -
दोस्तों, जीवन की कई सारी अनकही दास्ताँ होती हैं जो बहुरंगी होती है| हम सुख के पलों को तो याद कर खुश हो जाते हैं| किन्तु दुःख के पलों को रोज-रोज सालों साल ढोते रहते हैं|
इसका प्रतिफल हताशा, निराशा के रूप में सामने आता है| और यही आगे चलाकर अवसाद (depression) का रूप ले लेता है| अतः ऐसी परिस्थिति से हमें बचना चाहिए|
इसके लिए हमें सकारात्मक विचार बनाए रखना चाहिए| जैसे हम सड़ी-गली चीजों को अपने पास संभाल कर नहीं रखते; उसी प्रकार नकारात्मक विचारों को भी हमें अपने दिमाग से निकाल कर फेंक देना चाहिए|
सुख-दुःख ज़िंदगी का हिस्सा है| जिस प्रकार दिन और रात का आना क्रमिक रूप से जारी रहता है; उसी प्रकार सुख और दुःख भी क्रम से आते रहते हैं| एक का दूसरे के बिना महत्व नहीं| जीवन जीने का नाम है| संघर्षों से मुंह न मोड़ें| एक न एक दिन विजयश्री अवश्य मिलती है|
प्रस्तुत शायरी को बस एक रचना, एहसास व मनोरंजन के रूप में देखें | यही मेरी आपसे विनती है |

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