A Motivational & Spiritual Poem: "मैं हूँ कौन?” आत्म-खोज की गहन यात्रा कराती कविता है|
हम पद, प्रतिष्ठा, मान-सम्मान दौलत आदि की चकाचौंध को अपनी पहचान मान लेते हैं| साथ ही हम खुद की पहचान दूसरों के माध्यम से और बाहर ही बाहर खोजते हैं| परन्तु स्थिति इसके उलट है|
दुनिया की भेड़जाल से इतर जब हम खुद की खोज की यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो वही असली खोज होती है; जो बाहर न जाकर हमारे अन्दर हमारी अंतरात्मा तक जा पहुँचती है|
यह कविता न केवल आपका मनोबल बढ़ाएगी और आपको प्रेरित करेगी बल्कि आपके भीतर छिपे आध्यात्मिक सत्य से भी आपको परिचित कराएगी।
संसार से अलग हटकर स्वयं से स्वयं की पहचान कराती प्रेरक-आध्यात्मिक कविता है - मैं हूँ कौन?
कविता - मैं हूँ कौन?
[नहीं मिला मुझे वह ज्ञान,
जो भेदभाव सिखलाता है|]-2
श्रेष्ठ मूल्य दिया मेरे पिता ने,
जो इंसानियत सिखलाता है।
नाम दिया उन्होंने कृष्ण ताकि,
श्री कृष्ण के जीवन को समझूं।
सूक्ष्म विवेक का उपयोग कर,
समत्व-भाव को मैं समझूं।
होली, दशहरा, दिवाली, छठ,
बड़े उत्साह से मनाना सीखा।
क्रिसमस, ईद, नानक आदि जयंती,
उसी उल्लास से मनाना सीखा।
ज्ञान, कर्म, भक्ति और प्रेम,
राम, कृष्ण का जीवन-दर्शन।
इंसानियत को गर अपना लें,
होंगे ईश के साक्षात दर्शन।
पर सबसे बड़ी चीज सीखा मैं उनसे,
वह था देशभक्ति का संस्कार।
गांधी, सुभाष, आज़ाद , भगत,
बिस्मिल, अशफ़ाक का संस्कार।
कहें गौड, रब, भगवान या अल्लाह,
हम ढूंढते ईश्वर को यत्र-तत्र।
भटकते रहते हैं सारी उम्र,
बस बटोरते रहते हैं धन यत्र-तत्र।
संतुष्ट होना है बहुत ज़रूरी,
पर रुकना इसका अर्थ नहीं।
कर्मपथ पे आगे बढ़ते जाना,
प्यास अनंत इसका अर्थ नहीं।
चाहता हूँ सम्पूर्णता से जानना,
हूं मैं कौन इस बात को।
दूजे से पहले खुद को समझना,
समझो तुम इस बात को।
परम आनंद है अंतर्मन ,
बढ़ते रहना हमारी पहचान।
अपना दीपक हम स्वयं हैं ,
मानवता हमारी पहचान।
दूजे को जानना अब छोड़ भी दो,
है जानना ज़रूरी ख़ुद को बहुत।
ज्ञान ढूंढ रहे बाहर ही बाहर,
अंदर से जानो खुद को बहुत।
अगर समझ गये इस बात को तो,
ध्यान इसके लिए बहुत ज़रूरी।
ध्यान बिना ये जीवन बेकार है,
लक्ष्य के लिए ये बहुत ज़रूरी।
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मिले जब भी थोड़ा भी समय,
खुद को टटोलो हूं मैं कौन।
उत्तर इसका मिलना जरूरी,
आखिरकार हूं मैं कौन।
आखिरकार हूं मैं कौन।।
- कृष्ण कुमार कैवल्य।
A Motivational & Spiritual Poem: मैं हूँ कौन? से संबंधित शब्दार्थ/भावार्थ -
l उल्लास - उत्साह, ख़ुशी, आनंद|
l ईश् - भगवान्, ईश्वर, रब, गौड, अल्लाह, सर्वशक्तिमान|
l समत्व भाव - (क) श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार योग की अवस्था, सुख-दुःख, लाभ-हानि, वांछित- अवांछित, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समान व स्थिर मनःस्थिति |
(ख) ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था-प्राप्त व्यक्ति में स्थित भाव समत्व-भाव कहलाता है |
l साक्षात् - प्रत्यक्ष/ प्रकट रूप से|
l यत्र-तत्र - यहाँ, वहाँ, इधर-उधर, जहाँ-तहां, अनेक स्थानों पर|
A Motivational & Spiritual Poem: "मैं हूँ कौन?" से संबंधित कुछ बातें -
जब अपने भीतर के आध्यात्मिक सत्य से हम परिचित होते हैं तब हमें अपनी पहचान समझ आती है |
दरअसल खुद से खुद को जोड़ना एक अत्यंत दुरूह कार्य है | अपने अन्तःकरण के नितल तक बिरले ही कोई पहुँच पाता है | और जो पहुँच पाता है वही मोक्ष/कैवल्य/निर्वाण की अवस्था (Salvation) को प्राप्त कर लेता है| यही ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था होती है |
धन्यवाद्|🙏
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