Poem on Apstein Files: "बेनकाब चेहरे" दोमुहे चेहरों के सत्य को उजागर करती कविता है|
एप्सटीन फाइल्स (Apstein Files) पूरे विश्व समाज के मुख पर एक कालिख है; जिसने मानवता को शर्मसार किया है| पद, प्रतिष्ठा, पैसे के दुरूपयोग ने 'एप्सटीन फाइल्स' के रूप में एक ऐसा सच सामने लाया है जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया।
यह कविता उन चेहरों की असलियत बयां करती है जो रोशनी में तो सफेदपोश हैं जबकि अंधेरे में आदमखोर। मैंने साहित्य के माध्यम से इस वैश्विक कड़वे सच को दर्ज करने की एक छोटी सी कोशिश की है|
हालांकि यह कविता एप्सटीन फाइल्स (Apstein Files) को लक्ष्य कर लिखी गई है। किंतु कविता के शब्द सार्वभौमिक और सार्वकालिक हैं|
कविता - एप्सटीन फाइल्स: बेनकाब चेहरे
अनेक सफेदपोश लोगों के हैं बहुत ही घिनौने चेहरे,
नीचता, हैवानियत, पाप के उनके दाग हैं बड़े ही गहरे।
हुआ सौदा मासूमियत का शीशे के विशाल भवनों में,
हुई जलकर भस्म कलियां नरपिशाचों के हवनों में।
टापुओं के उन सभी कमरों में था हैवानों का ख़ूब बसेरा,
चारों तरफ थी चकाचौंध, था सुताओं की दुनिया में अंधेरा।
पंडोरा-बॉक्स के खुलते ही चोरों में दोस्ती लगी खटकने,
अपराध की दीवारें इन फाइलों से जल्दी लगी हैं चटकने।
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कैसी सोच है, कैसी मंसा ऐसे कथित संभ्रांत लोगों की?
मिलने लगी है जानकारी अब उनके पाले गंदे रोगों की।
तार-तार हुई थी इंसानियत शोर उनके अब आने लगे हैं,
घटिया, लंपट, दुष्ट, नीच वे लोग 'मुंह की खाने' लगे हैं।
पर संभव है यह भी हो जाए इस मामले की लीपापोती,
बिक जाएं जांच करने वाले मिल जाए यदि पैसे, मोती।
भेदभाव है विकासशील देशों में ये तो समझ है आता,
भेदभाव है विकासशील देशों में ये तो समझ है आता|
विकसित देश भी इसमें कम नहीं, है झूठी डफली बजाता।
है झूठी डफली बजाता।।
- कृष्ण कुमार कैवल्य।
Poem on Apstein Files: "बेनकाब चेहरे" से संबंधित शब्दार्थ/भावार्थ -
* बेनकाब - बिना नकाब के, सार्वजनिक करना, पर्दाफाश करना|
* सफेदपोश - सज्जन, कुलीन, शिष्ट, सभ्य, शारीरिक कार्य करने के बजाए मानसिक कार्य करके उच्च जीवन शैली जीने वाले लोग, भलमानस लोग, प्रतिष्ठित लोग (White -collar)
* आदमखोर - नरभक्षी, आदमी खाने वाला, इंसान के रूप में हैवान के अर्थ में |
* सार्वभौमिक - पूरी पृथ्वी के लिए, सम्पूर्ण विश्व, हर जगह व सभी प्राणियों में व्याप्त|
* सार्वकालिक- सब समय का , सभी समय, सब कालों से संबंधित,
* सुता - पुत्री, बेटी, नंदिनी, लड़की,|
* पंडोरा-बॉक्स (Pandora's Box) - मुसीबतों का पिटारा, आफत की टोकरी|
* संभ्रांत - अभिजन, कुलीन, उच्च वर्ग, कुलीन, सम्मानित, प्रतिष्ठित|
* कुछ बातें -
दोस्तों, समाज में नैतिक मूल्यों में भयंकर गिरावट आती जा रही है। पैसा, रसूख, ताकत के बल पर व्यक्ति हर काम करने को आतुर है| भले ही वह नैतिक हो या अनैतिक। अपना प्रत्येक कार्य किसी भी हालत में व किसी भी कीमत पर करने की चाहत समाज को और गर्त में ले जा रही है।
आज समाज में लाखों लोग ऐसे हैं जिनका अपना उंगली कटे तो उन्हें दर्द होता है और दूसरे के साथ ऐसा हो तो हंसी आती है। समाज में एहसासों का मर जाना इंसानियत का मर जाना है|
कोर्ट -कचहरी में जाने के बाद का एक नमूना देखिए। जिस पर अन्याय होता है, वह ईश्वर का सहारा लेता है और दिल से ईश्वर की शपथ लेता है।
वहीं इसके ठीक उल्ट जो अत्याचारी होता है, अन्याय करता है, पाप कर्म करता है उसके मन से ईश्वर का डर समाप्त हो चुका होता है और वह गीता/ कुरान/ बाईबल/ गुरु ग्रंथ साहिब की शपथ लेकर भी झूठ ही झूठ बोलता है ताकि वह सज़ा से बच सके। उसे इहलौकिक सज़ा से डर है; जबकि पारलौकिक दंड बस कहने मात्र के लिए है| उसके मन में खौफ है तो सिर्फ़ कानून का, सज़ा का। बस।
ये बातें किसी एक समाज या देश के लिए नहीं हैं। यह स्थिति संपूर्ण विश्व में व्याप्त है।


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