Poem on Language in Hindi

Poem on Language in Hindi - "भारतीय भाषा"

 
Poem on Language in Hindi - "भारतीय भाषा" एक ऐसी कविता है जो हमारे देश की भाषाओं की वर्तमान स्थिति को दर्शाती है|

भारत में अनेक भाषाएं बोली जाती हैं| जैसे - हिंदी, बांग्ला, उड़िया, मणिपुरी, असमी, गुजराती, मराठी, राजस्थानी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, हिमांचली आदि-आदि| इन भाषाओं में कई की उपभाषाएँ भी मौज़ूद हैं

 दुनिया भर में किसी एक देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में एक देश भारत भी है| दुर्भाग्यवश ब्रिटिश काल में आंग्ल सत्ता ने न सिर्फ़ भारत का आर्थिक शोषण किया वरण सामजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक व भाषाई पतन में भी खुलकर ख़ूब बर्बादी को अंजाम दिया| भारतीय भाषाओं की दुर्गति में मैकाले की शिक्षा-पद्धति ने प्रचंड रूप से काम किया| इसका खामियाजा हम आज तक स्पष्ट रूप से देख रहे हैं



  कविता - "भारतीय भाषा"


बोल रही मैं भारतीय भाषा,
डुबोया मुझको अपनों ने।
बोल रही मैं भारतीय भाषा,
डुबोया मुझको अपनों ने।
पश्चिम की नकल की इच्छा
व ख़ास करने के सपनों ने।




अब पच्छिम को भला क्या दोष दूं?
कम दोषी है मैकाले
ज़्यादा तो कुछ अपने हैं घाती,
आज भी दिल के हैं काले

कई मूर्ख हुक्मरान यहां के,
हद से ज़्यादा रहे बेशर्म।
कर दफ़न अपनी भाषाओं को,
ख़ूब निभाते रहे अपना धर्म।

आज़ादी से आज तक देखो,
बनी नहीं है बात।
सुधार कहां हुई है अब तक?
ढाक के तीन पात।




भ्रष्टाचार, स्वार्थ, भेदभाव,
जहां होगा बहुत चरम पर।
हाल वहां ईश्वर ही जानें,
सब कुछ उनके करम पर।

काम की बातें बहुत हैं होतीं,
होता नहीं पर काम।
इधर-उधर और दायां, बायां,
दिखता ख़ूब ताम-झाम।

किसी हुक्मरान की नहीं हुई हिम्मत,
हो काम ठोस भाषा पर।
सच की धरा पे बढ़ रहे थोड़े,
नहीं चलता देश पाशा पर।


Image by Unsplash


वोट का समय है जब आता,
कई देते जनता को झांसा।
फेंकते ख़ूब ज़हरीले तीर,
ये हैं जाति, क्षेत्र, धरम,भाषा।

हर देश की होती अपनी एक भाषा,
वे करते हैं उस पर काम।
अपनी भाषाओं पर काम क्यों नहीं करते हम?
हमारी भाषाएं समृद्ध तमाम।

अपनी भाषा पर होता कार्य जब,
मौलिकता उसमें है होती।
गहन खोज संभव हो पाता,
मिलता जाता है मोती।

स्वाभाविक प्रतिभा इससे निखरती,
है कुंठा दूर हो जाता।
विकास की धारा स्वत: फूटती,
और वैभव, समृद्धि है आता।

परंतु,
आख़िरकार सच्चाई लो ये जान,
हमारी भाषाएं रहेगी गौण।
रहेगा वर्चस्व केवल  इंग्लिश का,
हमारे गणमान्य रहेंगे मौन।

इंग्लिश का नहीं विरोध भारत में,
है ये जानता हिंदुस्तान।
पर अपनी भाषा की कीमत पर,
क्यों  बांट रहे अंग्रेजी ज्ञान?





जिस पौध को मैकाले ने बोया,
बन गया वो लिप्टस पेड़
नीम, पीपल, बरगद आदि को,
वो करने लगा है ढ़ेर।

नहीं कविता है ये आईना,
दिखलाती है सच्चाई‌।
अपनी सभ्यता व संस्कृति पर,
 ख़ूब हमने मात है खाई।





राष्ट्र-भावना जब धधक उठेंगी,
और होगी मांग स्वदेशी प्रथम।
राष्ट्र-भावना जब धधक उठेंगी,
और होगी मांग स्वदेशी प्रथम।
भाषा का उत्थान तभी होगा,
वही होगा अपना सच्चा कदम।
वही होगा अपना सच्चा कदम।।
        -कृष्ण कुमार कैवल्य।




 Poem on Language in Hindi - "भारतीय भाषा" से संबंधित शब्दार्थ/भावार्थ - 

  • हुक्मरान - सत्ताधारी, शासकवर्ग|
  • आंग्ल-सत्ता - अंग्रेजी सरकार, ब्रिटिश सरकार, यू.के./इंग्लैंड की सरकार|
  • खामियाजा - दंड, परिणाम, सजा 
  • पच्छिम - पश्चिमी देश ( यूरोपीय देशों ख़ासकर ब्रिटेन के सम्बन्ध में )|
  • ढाक के तीन पात - स्थिति में कोई बदलाव न होना|
  • कुंठा - निराशा, घुटन, हताशा को जन्म देने वाली बीज|



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