Heart-Touching Story on Friendship in Hindi

 

Heart-Touching Story on Friendship in Hindi - "दोस्त" दोस्ती पर लिखी गयी अत्यंत मार्मिक कहानी है|

यह कहानी 90 के दशक के दो मित्रों की है, जिनके अटूट प्रेम ने दोस्ती की मिसाल कायम कर दी| और यह साबित कर दिया कि यदि हमारा एक भी सच्चा दोस्त है तो हम दुनिया के सबसे भाग्यशाली लोगों में से एक हैं|

नमन और आज़ाद बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों का घर मुश्किल से एक किलोमीटर की दूरी पर था। वे पटना के एक केंद्रीय विद्यालय में सातवीं क्लास में पढ़ते थे।

 क्या स्कूल और क्या घर, सभी इनकी दोस्ती से परिचित थे। इनकी मात्र 2 वर्षों की ही पुरानी दोस्ती थी। परंतु ये दोस्ती बहुत गहरी थी। दोनों की जोड़ी को लोग दो नहीं बल्कि 11 समझते थे| दोनों ने धर्म की दीवारों को गिराकर दोस्ती का एक हरा भरा मैदान तैयार कर दिया था। इनका परिवार इनकी दोस्ती के आगे नतमस्तक था।

 



स्कूल में अगर एक मित्र अनुपस्थित रहता तो दूसरा परेशान हो जाता। और साथ रहने पर सारा जहां भी उनके लिए विशेष माइने नहीं रखता। जब वे घर जाते तो संध्या काल में मैदान में अन्य साथियों के साथ कभी फुटबॉल, कभी कबड्डी आदि खेलते। विपरीत टीम में होने पर दोनों को कभी अच्छा महसूस नहीं होता। नमन कभी भी आज़ाद को हारते नहीं देख सकता था। और आज़ाद हमेशा नमन की जीत की कामना करता। इसी कारण दूसरे लड़के भी यही चाहते कि वे दोनों एक ही टीम में रहें, ताकि खेल का मजा बरकरार रहे।

 अभी सातवीं क्लास का परिणाम निकला ही था कि नमन के पिता जो रेलवे में एक अधिकारी थे, का प्रमोशन के पश्चात तबादला राजस्थान के जयपुर जिले में हो गया। नमन के परिवार के लिए यह समाचार सुखद था। लेकिन यह खबर नमन के लिए अत्यंत पीड़ादायी था।

वह शाम का समय था। हरि-हरि घास युक्त मैदान में चुपचाप उदास बैठा नमन को देखकर आज़ाद ने पूछा - क्या बात है नमन?

नमन ने सारी बातें बताई और रोने लगा। नमन को रोता देख आज़ाद भी फफ़क-फफ़क कर रोने लगा और नमन से लिपट गया।

 

दोनों कुछ देर तक खामोश रहे। फिर नमन ने कहा - यार! परसो शाम की ट्रेन से हमलोग जा रहे हैं। जाने से पहले तुम रोना मत। नहीं तो मैं जा नहीं पाऊंगा। क्योंकि मैं तुमसे भी ज्यादा भावुक हूं। यह सुनकर आज़ाद सिर हिलाता है।

फिर थोड़ी देर बाद आज़ाद कहता है- यार, मेरे घरवाले कहते हैं कि हमलोग गरीब हैं। परन्तु आज मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं दुनिया का सबसे अमीर लोगों में से एक हूं। क्योंकि मेरे पास तुम जैसा दोस्त है। भले ही हम लोग कुछ सालों के लिए दूर हो जाएं, लेकिन तुम मेरे दिल में सदा रहोगे। और जब हम बड़े हो जाएंगे तब हम हर हालत में साथ-साथ रहेंगे। ये मेरी बात याद रखना।

नमन की आंखें उसकी सारी बातों को सुनती और स्वीकार करती जा रही थीं।

 सोमवार का दिन था। आज़ाद ने अपने अम्मी से कह रखा था कि आज वो स्कूल नहीं जाएगा और दिनभर नमन के साथ रहेगा। हालांकि आज़ाद के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि नमन आज़ाद से दूर जाए। लेकिन चाहने से कुछ भी नहीं होता। और नमन के घरवाले भी ऐसा ही चाहते थे परंतु रोटी जो न कराए।

 आज़ाद के अब्बू अपनी लम्बाई के लिए प्रसिद्ध थे| भले ही उन्होंने औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, किन्तु वे नेक व आध्यात्मिक इंसान थे| वे भी आज़ाद के साथ नमन को रेलवे स्टेशन तक पहुंचाने गये। थोड़ी देर के बाद ट्रेन की सिटी बजी। दोनों मित्रों की डबडबाई आंखें कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कह रही थीं| भावनाओं का सैलाब इतना था कि वे एक-दूसरे से कुछ भी बात कर पाने की स्थिति में नहीं थे|

आज़ाद अपने घर आ गया। ग़रीबी ने बीमारी के रूप में धीरे-धीरे आज़ाद की मां को एक वर्ष के अन्दर ही छीन लिया। आगे छह वर्ष के अंदर ही उसके पिता की एक किडनी के खराब होने की जानकारी मिली।  वह तुरंत दो साथियों के साथ अपने अब्बू को अस्पताल ले गया|

 



इंटर पास उस विद्यार्थी के आगे बहुत कुछ चारा न था। क्योंकि एक तो ग़रीबी और ऊपर से अब्बू बीमारी ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था। एक निजी अस्पताल ने पैसे के अभाव में उसके अब्बू को छुट्टी दे दी। भर्ती के दौरान उस अस्पताल ने उनका ग़लत इलाज किया और उनकी दूसरी किडनी भी खराब कर दी।

अब एक सरकारी अस्पताल में उनका इलाज चलने लगा। परंतु महंगी-महंगी दवाओं की ख़रीद के अभाव में उसके अब्बू का दम टूट गया।

अब आज़ाद अकेला था। वह अपना शहर छोड़कर काम की तलाश में इधर-उधर भटकता रहा। उसके पास न अपना घर था और न माता-पिता| मुफ़लिसी, मजबूरी ने अंततः उसे एक अपराधी बना दिया। और धीरे-धीरे वह माफिया बन गया। 

 समय बिता। उधर नमन खुफिया विभाग में एक अधिकारी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने लगा। वह बड़ा ही तेज-तर्रार अधिकारी था| इत्तिफ़ाक से संगठित अपराध की कड़ी की खोज में उसके कर्तव्य ने उसे उसी माफिया गिरोह के इर्द-गिर्द पहुंचा दिया।.....

 मध्य प्रदेश के एक जिले का एक छोटा सा होटल जहां आज़ाद अपने साथियों के साथ कुछ बातें कर रहा था।

उसकी नज़र दूर बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी। जो और कोई नहीं “नमन” ही था। आज़ाद को कुछ समझ में आया। सभी उठे और तुरंत झटके से पिस्टल के बल पर नमन को जबरन अपने साथ पकड़कर बाहर ले गए। फिर गाड़ी में बिठा कर अज्ञात जगह की ओर चल दिए।....

एक विचित्र सुनसान मकान| वहां आज़ाद के साथियों ने नमन को ख़ूब मारा पीटा। फिर एक अपराधी दिलावर खान ने आज़ाद से कहा – अनिस भैया, ये कुछ बता तो नहीं रहा, पर निश्चित ही ये पुलिस का आदमी है| आज़ाद ने अपने को सुरक्षा कारणों से अनिस के रूप में घोषित कर रखा था|

कुछ देर बाद आज़ाद नमन के पास पहुंचा। लगभग 22 वर्षों के पश्चात दोनों का आमना-सामना हुआ था। परंतु दोनों ने एक-दूसरे को बिल्कुल भी नहीं पहचाना।

 आजाद ने कहा- देख भाई। हम जान चुके हैं कि तू पुलिस का आदमी है। भले ही तू अपने बारे में कुछ न बताएं पर तुम्हारे ज़िंदा रहने से हम सब की ज़िदगी खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए मरने से पहले कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो।

नमन ने पूरे आत्मविश्वास से कहा- मैंने आज तक कभी किसी के साथ गलत नहीं किया। हाँ, मैं क़ानून का रखवाला हूँ और सदा कानून का साथ दिया। हो सके तो तुम सब कानून के समक्ष आत्म-समर्पण कर दो। मैं तुम सब की सजा अवश्य कम करवाऊंगा। ये मेरा वादा है|

आज़ाद ने कहा - हमारी बातें छोड़ो। तुम अपनी कहो। कोई अंतिम ख्वाहिश हो तो बता दो।

 नमन ने कुछ खोए हुए अंदाज में कहा- मुझे मरने का कोई डर नहीं| और जहाँ तक मेरी ख्वाहिश की बात है तो मेरी यही तमन्ना है कि हमारा भारत अपराध- मुक्त हो जाए। पर ये तुम सब के बस की बात नहीं। हां, इतनी ख़्वाहिश वर्षों से ज़रुर रही कि मरने से पहले अपने बचपन के मित्र को खोज लूं। पर वह सपना भी अब सपना ही रह जाएगा।

 

आज़ाद ने उत्सुकता पूर्वक पूछा - तो कहो क्या है तुम्हारे मित्र का नाम और वह कहां रहता है? 

नमन अपने मित्र को याद करते हुए कहा- मेरे दोस्त का नाम आज़ाद है। जो कभी पटना में रहता था पर आज गुमनाम है।

आज़ाद ने चौंक कर कहा - तुम्हारा नाम क्या है?

नमन ने कहा- मेरा नाम नमन है।

 

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नमन! यह नाम सुनते ही आज़ाद समझ गया कि ये मेरा बचपन का दोस्त नमन है। वह अत्यंत भावुक हो गया पर अपने आप पर जबरदस्ती नियंत्रण पाते हुए उसने नमन से कहा - मैं एक आज़ाद को जानता हूं जो कभी पटना में रहता था। उसने अपने और अपने एक मित्र नमन के बारे में कुछ खास बातें बताई थीं। तुम उन बातों की पुष्टि कर दो तो मैं तुम्हें उससे मिलवा दूंगा। शायद वही तुम्हारा मित्र हो|

 दुश्मनों के बीच घिरे होने के बावजूद नमन की आंखें चमक उठीं। उसे कुछ अलग तरह का एहसास होने लगा| उसने कहा - ठीक है भाई, एक बार मुझे उससे मिलवा दो। फिर मुझे मरने की भी कोई परवाह नहीं। पूछो, मुझसे क्या पूछना चाहते हो?

 आज़ाद उत्सुक होकर उससे कुछ अलग-अलग तरह के प्रश्न पूछे, जो सिर्फ उसका मित्र नमन ही बता सकता था। सभी प्रश्नों के उत्तर नमन बहुत अच्छी तरह से दे दिया क्योंकि वह उसका ही मित्र था। उन प्रश्नों में एक बहुत ही खास प्रश्न था। आज़ाद ने कहा -  “छठी क्लास का जब रिजल्ट निकला तब आज़ाद फर्स्ट आया था। ख़ुश होकर उसके पिता ने शाबाशी के रूप में उसे क्या दिया था?

नमन आज़ाद की ओर देखता है। आज़ाद की आंखें, उसका व्यक्तित्व, उसकी व्यग्रता, उत्सुकता,  बेचैनी आदि बहुत कुछ बयां कर रही थीं।

 अब नमन पूरे भरोसे के साथ डबडबाई आँखों से भावुक अंदाज में आज़ाद से कहा- अब बस भी करो मेरे यार। मैं जान गया हूं कि तुम ही आज़ाद हो। फिर भी तुम्हारे प्रश्न का उत्तर यह है कि तुम्हारे अब्बू ने तुम्हारे फर्स्ट आने पर तुम्हें डंडे से पिटाई की थी। और मेरे प्रार्थना करने पर उन्होंने तुम्हें छोड़ दिया था।

आज़ाद अब रोने लगा था|

 थोड़ा रुक कर फिर नमन कहता है यार, जिसको तुम फर्स्ट कह रहे हो दरअसल वह फर्स्ट नहीं बल्कि एक विषय में लाल दाग यानी क्रॉस था। तुम एक विषय में फेल थे। तुमने अपने अब्बू को मैथ्स में लगे उस एक लाल दाग दिखाते हुए कहा था कि एक लाल चिन्ह का मतलब फर्स्ट होता है अब्बू। मैं क्लास में फर्स्ट आया हूं। जिस पर मैंने तत्काल उनसे कहा था कि नहीं चाचा जी ये झूठ बोल रहा है। यह तो एक विषय में फेल है। इसलिए मैथ्स में लाल दाग लगा है। मैं आपसे झूठ नहीं बोल सकता। भले ही आज़ाद मेरा अत्यंत प्रिय दोस्त है।

 इतना सुनते ही आज़ाद दौड़ते हुए आता है और कहता है- नमन! मेरा यार नमन! तुम मेरे नमन हो। तुरंत उसके हाथों को खोल दिया और फिर उसके दाहिने हाथ के अंगूठे को देखा। अब आज़ाद पूरी तरह समझ गया कि वह और कोई नहीं उसका मित्र नमन ही है। क्योंकि नमन के दाएं हाथ के अंगूठे पर दो तिल के निशान थे।

 आज़ाद नमन से लिपटकर ख़ूब रोने लगा और कहा कि मुझे माफ़ कर दो यार। मुझे जीने का हक नहीं। मैंने तुझे बहुत पिटवाया। मुझे जीने का बिल्कुल ही हक़ नहीं है|

नमन भी फटी आंखों से अपने मित्र को देखता रहा और बेजान सा होकर फूट-फूट कर रोता रहा। कहा कि यार, आज मुझे सब कुछ मिल गया। दोनों गले से लिपटकर कुछ देर तक रोते रहे। फिर नमन ने कहा-  यार, मिला भी तो मैं किस मोड़ पर तुमसे। मैं तुम्हें गिरफ्तार करूं तो कैसे? और न करूं तो अंतरात्मा जीवन भर धिक्कारते रहेगी। इस कारण  मैं अब खुद ही जीना नहीं चाहता। इसलिए अपने साथियों को कहो कि वे मुझे मार दें|

 यह सुनकर आज़ाद अपना पिस्टल निकाल कर टेबल पर रखते हुए कहा- नमन, मेरे यार| अब तो मैं मर भी जाऊं तो कोई गम नहीं। मुझे यहाँ से ले चल यार। बहुत जी लिया अपराध की ज़िंदगी। मुझे इस नरक भरी ज़िंदगी से मुक्त कर।

 यह सुनते ही नमन अपने मित्र से जोर से लिपट गया। आज दोनों को मानो सारी दुनिया मिल चुकी थी।........

 फिर आज़ाद अपने दोस्तों से कहता है -  यही मेरा बचपन का दोस्त नमन है। ये मेरा सब कुछ है जो मुझे मेरी जान से भी अधिक प्रिय है। और मैं सच में आज़ाद ही हूँ जो आज पुनः जीवित हो उठा है|

 फिर सांसें भरते हुए कहता है - साथियों, हम सब बरसों बहुत भाग चुके। भागते-भागते अब मैं स्वयं थक गया हूं। ऐसे कुत्ते-बिल्ली की ज़िंदगी और ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने से अच्छा है एक दिन की चैन की मौत। तुम सब मेरे साथ सरेंडर करना चाहते हो तो कर सकते हो।

फिर रुक कर कहता है - परंतु जिनको जीवन भर भागते रहना है वे यहां से जा सकते हैं।

नमन कहता हैं - यदि आप सब सरेंडर कर देते हैं तो मैं आप लोगों को कम से कम सजा दिलवाने का वचन देता हूं|

 इस पर आज़ाद का बायां हाथ कहा जाने वाला उसका मित्र दिलावर खान कहता है-  हम लोग यहां से न हीं जाएंगे और न हीं सरेंडर करेंगे। पर तुम दोनों दोस्तों का ज़िंदा रहना हमारे लिए अच्छा नहीं है। क्योंकि तुम दोनों कभी भी हमारे लिए मुसीबत बन सकते हो। अब मरकर साथ में दोस्ती निभाते रहना|


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यह कहते हुए उसने तुरंत पिस्तौल निकाल ली और गोली चला दी| आज़ाद नमन के आगे आते हुए दौड़कर दिलावर खान को पकड़ना चाहता है। किंतु इस बीच उसे चार गोलियां लग गईं।

मौके की नज़ाकत को देखते हुए नमन बिजली की गति से टेबल की ओर लपका और टेबल  पर रखे आज़ाद की पिस्टल को उठाकर तुरंत दिलावर खान  के गले और सीने में दो गोलियां उतार दी। गोली लगते ही वह वहीं गिर गया|

 अब आज़ाद भयानक दर्द को सहते हुए नमन को पकड़कर तेजी से बगल के एक रूम में ले गया और दरवाजे को बंद कर दिया।

दोस्त का हाथ पकड़ कर भावुक होकर वह बहुत रोता है। फिर कहता है-  यार, तू इतनी देर से क्यों मिला? अब मुझे जीने की इच्छा हो रही है| किन्तु मैं हमेशा के लिए जा रहा हूं।

 फिर आज़ाद साँसे भरते हुए -  मैं खुशनसीब हूं कि जाते-जाते अपने दोस्त से मिल लिया। अपने शरीर से निकलते हुए खून को देखकर आजाद कहता है - मुझसे थोड़ा दूर रहो मेरे यार। मुझे गोली लग चुकी है।

 नमन उससे ज़ोर से लिपटकर रोने लगा और कहा – काश!  तुम्हारे बदले मुझे गोली लगी होती।

इसी बीच बाहर से आवाज़ आती है – अनिस भाई! मैं प्रकाश| हमारे पांच साथी तो भाग गए, पर हम सब आत्मसमर्पण करना चाहते हैं।

हमसे आप दोनों को कोई खतरा नहीं है। आप लोग बाहर आ सकते हैं।

 

नमन उनपर विश्वास न करते हुए अन्दर से ही कहता है कि ठीक है। आप लोग थोड़ी देर यही रुकिए| पुलिस पहुंच ही रही है। नमन पहले ही एक संदेश अपने मुख्यालय में भेज चुका था।

आज़ाद कहता है -  यार तुझसे बहुत सारी बातें करनी है| किन्तु मेरे पास समय नहीं है||

नमन ने रोते हुए कहा -  मेरे यार,  तुम्हें कुछ नहीं होगा| बस एक - दो मिनट में हम यहाँ से हॉस्पिटल चलेंगे|

आज़ाद ने कहा -  नमन, मैंने तो शादी नहीं की। तुम्हारे बच्चे हैं या नहीं।

नमन कहता है - अभी तो नहीं। पर 2 महीने बाद शिशु का आगमन होने वाला है। लड़का हुआ तो आज़ाद,  लड़की हुई तो मुक्ता

 

यह सुनकर आज़ाद थोड़ा मुस्कुराता है। फिर उसे अचानक अजीब सी छटपटाहट होने लगती है। और आज़ाद उसके हाथों में ही दम तोड़ देता है।

नमन की आंखों से अब आंसू नहीं मानो अंगार निकल रहे थे।


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इस बीच ख़ुफ़िया के अन्य लोग व पुलिस वहां आती है और आवाज़ देती है - नमन सर! दरवाजा खोलिए। हम थ्री वन गैलेक्सी आ गए हैं|(यह उनका अपना कोड वर्ड था)|

 नमन दरवाजा खोलता है। फिर थर्राकर दरवाजे के पास ही बैठ जाता है। मानो उसके शरीर में जान ही न हो। उसके सफेद वस्त्र आज़ाद के रक्त से लाल नजर आ रहे थे। और उसकी आंखें पथराई सी हो गई थीं। अपने मित्र से मिलने पर उसे अभी-अभी सारी दुनिया मिली ही थी कि उसका सब कुछ उजड़ सा गया।

 इसी बीच असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर कहता है- सर, एक अपराधी अभी जीवित है, जिसे दो गोलियां लगी हैं।

यह सुनते ही नमन को मानो बज्र सी शक्ति मिल गई। वह उठा| तुरंत बाहर जाकर देखता है कि वह अपराधी और कोई नहीं बल्कि दिलावर खान ही था।

 

दिलावर खान मुंहचोर की तरह नमन को देखता है और कहता है सर मुझे माफ कर दीजिए। मैं सरेंडर करने के लिए तैयार हूं। मुझे माफ कर दीजिए सर। मुझे माफ कर दीजिए।

 आंखों में अंगार लिए गुस्से से नमन दिलावर खान को कहता है- तुझे मौका दिया गया था, पर तूने मुझे ही नहीं अपने साथियों को भी धोखा दिया। अब यदि भगवान भी आ जाएं तब भी मैं अपने दोस्त के हत्यारे को जिंदा नहीं छोडूंगा। यह कहकर वह दिलावर खान को ख़ूब मारता है और उठाकर खिड़की से नीचे फेंक देता है। गिरते ही दिलावर खान की मौत हो जाती है।

 इसके बाद सभी एक बड़ी सी गाड़ी में बैठकर पुलिस थाने की ओर रवाना हो जाते हैं।

 

सबक-

 1. हमें समाज के कमजोर या अंतिम तबके के लोगों की मदद करनी चाहिए। अगर हमारा पड़ोस जल रहा है तो हमारा घर भी एक न एक दिन अवश्य चलेगा।

 2. ग़लत का अंजाम हमेशा ग़लत ही होता है। अतः बुराई से बचें।

 3. दोस्ती बहुमूल्य होती है। यदि सारी दुनिया में हमारा एक भी सच्चा दोस्त है तो हम दुनिया के सबसे धनवान लोगों में से एक हैं।

4. क़ानून का पालन करें| जिएं और जीने दें|

धन्यवाद। 🙏

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