Poem on Poetry in Hindi : "कविता" – यह रचना कविता पर कुछ शब्द लिखने का एक प्रयास भर है|
मानव मस्तिष्क में अनेक सुविचार आते रहते हैं| कविता उन सुन्दर विचारों का सर्वोत्कृष्ट फल होता है|
कविता की रचना में दिमाग नाव बनता है; जबकि अंतर्मन उसका खेवनहार| यह सच्चे अर्थों में “मानवता से साक्षात्कार है|
“कविता”
आवाज़ निकलती है जो दिल से
वो कविता बन जाती है|
क्षितिज पार जाती जो दृष्टि
वो इसमें आ जाती है|
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अंतर्मन की नाद कविता,
आवाजों का मौन कविता,
आँखों की है जोत कविता,
दिल की है धड़कन कविता|
मुक्तक हो या छंदबद्ध हो,
सभी रुप में अनुपम है कविता|
हर रंग जीवन के इसमें,
गागर में सागर है कविता|
कंचन से सुन्दर है कविता,
गंगाजल सी बहती कलकल|
अति धवल अमरता इसकी,
नारायण का है ये कमल|
कविता का नहीं जात-धरम,
शुद्ध रुप होती है कविता|
सारे बंधन से है ये ऊपर,
बसंत की होती ये सरिता|
मन खुश हो या हो दुःखी,
कविता तो सारा आकाश है|
मानवता चढ़ता है शिखर पर,
होता कहाँ मूल्यों का ह्रास है?
अनुभूति नहीं केवल आनंद की,
सत चित आनंद भी मिलते हैं|
कविता तो जीवन के फूल हैं,
बगिया में अवश्य ही खिलते हैं|
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कविता होती सविता शाम है|
बहुत विशेष व दिव्य काम है|
दिखता मुझे कविता में ईश्वर,
कविता मेरा चारो धाम है|
जब कविता रचता है कवि,
अलौकिक हो जाता है|
इहलोक से परलोक तक
विचरण कर वो आता है|
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महाशून्य रच जाता इसमें,
फिर भी होता ये कम|
कुछ ऐसी रचने की इच्छा,
बस जाएं जिसमें ब्रह्म|
बस जाएं जिसमें ब्रह्म|
===कृष्ण कुमार कैवल्य===
Poem on Poetry in Hindi : "कविता" से जुड़े शब्दार्थ/भावार्थ-
क्षितिज – वह स्थान जहाँ धरती एवं आकाश मिलते से प्रतीत होते हैं|(कविता में ‘क्षितिज पार’ शब्द अनंत दूरी के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है)|
अंतर्मन – अंतरात्मा|
नाद – आवाज़, गूँज
अनुपम – अनूठा, अनोखा|
जीवन के हर रंग – ज़िंदगी की विभिन्न दशाएं, जिसमें सुख और दुःख सभी समाहित रहते हैं|
गागर में सागर – काफ़ी कम शब्दों में बहुत अधिक भावों-विचारों को प्रकट करना|
धवल – स्वच्छ, निर्मल, सफेद|
जात-धरम – जाति-धर्म|
सरिता – नदी|
ह्रास – कमी, अवनति|
मूल्य – मानवीय मूल्य (दया, प्रेम, करुणा, क्षमा, नैतिकता आदि भाव)|
सत-चित-आनंद – ईश्वर, ब्रह्म, सर्वशक्तिमान|
बगिया में फूल का खिलना – ज़िन्दगी को सार्थक बनाने के अर्थ में यहाँ प्रयुक्त|
सविता – तेज, सूर्य|
अलौकिक – जो इस दुनिया का न हो, इस दुनिया से अलग|
विचरण करना – घुमना|
महाशून्य – ईश्वर की अतिविशाल रचना|
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