Realistic-Sensitive song /Lyric in Hindi - "कलयुग का समय: ज़मीर की नीलामी" आज की कड़वी सच्चाई को व्यक्त करती कविता है|
दोस्तों, आज ‘दोहरे चरित्र’ वालों की कमी नहीं है| समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है| इस तरह के व्यक्ति इतने चालाक एवं धूर्त होते हैं कि उनको पहचानना बहुत मुश्किल हो जाता है| ऐसे लोग ज़माने के सामने कुछ अच्छा काम करके अपनी सज्जनता दिखाते हैं; जबकि पीठ पीछे वे सारे काले धंधों में रत रहते हैं| इनकी ऊँची पहुँच इन्हें इनके ‘वास्तविक जगह’ पर जाने नहीं देती| जरूरत है अच्छे लोगों को जागरूक होने की और ऐसे दोमुहों को पहचानने की ताकि ‘कानून की तलवार’ से इनको काटा जा सके|
“कलयुग का समय
〈 कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|〉-2
खूब बढ़ रहा पाप का धंधा,
बना ज़माना है अंधा|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का| } -2
कंचन खूब सुहाता है,
नैतिकता नहीं भाता है|
कंचन खूब सुहाता है,
नैतिकता नहीं भाता है|
झूठ की नींव पे खड़ी ज़िंदगी,
मोल नहीं है वचन का|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -2
दोहरे रुप में जीते हैं ये,
शराब बहुत ही पीते हैं ये|
दोहरे रुप में जीते हैं ये,
शराब बहुत ही पीते हैं ये|
बस इसको ही अमृत जानें,
बना ये राह व्यसन का|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -2
You can also read the other sensitive and realistic poem – “कोरोना और हम”.
अपने ज्ञान के मद में चूर ये,
तनिक में बन जाते हैं क्रूर ये|
अपने ज्ञान के मद में चूर ये,
तनिक में बन जाते हैं क्रूर ये|
अपने ही सुर को अच्छा मानें,
सुनते नहीं ये किसी का|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -2
प्रेम जगत का सार है होता,
इसके जैसा नहीं कुछ भी होता|
प्रेम जगत का सार है होता,
इसके जैसा नहीं कुछ भी होता|
इसका मोल नहीं ‘कामी’ समझें,
‘काम’ है सब कुछ इनका|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -2
.है परवाह न सीमा की,
धरती माँ की अपनी माँ की|
है परवाह न सीमा की,
धरती माँ की अपनी माँ की|
अपने ज़मीर को बेच रहे ये,
रहा ईमान न इनका|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -2
नाम से नहीं कोई रावण,
चारों ओर रावण-अहिरावण|
नाम से नहीं कोई रावण,
चारों ओर रावण-अहिरावण|
राम के नाम पे दे रहे धोखा,
है ये सच इस युग का|
{ कैसा समय है कलयुग का,
कैसा समय ये कलयुग का|} -4
***कृष्ण कुमार कैवल्य***
Realistic-Sensitive song /Lyric in Hindi - "कलयुग का समय: ज़मीर की नीलामी" से जुड़े शब्दार्थ /भावार्थ –
कंचन –सोना (यहाँ धन-दौलत के अर्थ में प्रयोग)|
व्यसन -बुरी आदत, लत|
मद – अहंकार, घमंड|
कामी – व्यभिचारी, व्यसनी|
काम – व्यभिचार, वासना|
ज़मीर – अंतर्मन, अंतरात्मा|
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