Quantum House | विज्ञान और आत्मा की रहस्मयी कहानी


Quantum House | विज्ञान और आत्मा की रहस्मयी कहानी के  सम्बन्ध में  डिस्क्लेमर/अस्वीकरण -

इस कहानी का उद्देश्य किसी भी तरह के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। कहानी में प्रयुक्त पात्र कल्पना मात्र से रेखांकित किए गए हैं।

कहानी से यदि किसी की भावना को तकलीफ पहुंचती है तो उसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूं। इस कहानी का मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन है।


 यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। इसका किसी भी जीवित अथवा  मृत व्यक्ति के साथ कोई संबंध नहीं है।

और यदि ऐसा पाया जाता है तो वह एक संयोग मात्र ही होगा।

         इस कहानी को किसी वैज्ञानिक तथ्य, अवधारणा अथवा आध्यात्मिक सत्य के प्रमाण के तौर पर न लिया जाए|


 

Quantum House | विज्ञान और आत्मा की रहस्मयी कहानी - इस कहानी के सम्बन्ध में प्रारम्भ में ही कुछ बातें स्पष्ट करना आवश्यक है| जो निम्नलिखित हैं -

 क्वांटम हाउस वैज्ञानिक स्पर्श लिए हुए एक भावनात्मक, रूहानी कहानी है। इस कहानी में हम आधुनिक विज्ञान की दुनिया में जीते हुए आत्मीय भावना के चरम स्पर्श को पाते हैं। अर्थात यह 'वैज्ञानिक कल्पना और रहस्य प्रधान' कहानी है|

 

कहानी में एक वैज्ञानिक द्वारा कुछ नया करने की चाह, उसके निजी खुशहाल भरी ज़िंदगी और जीवन में आए दर्द भरे एहसासों व गमों को उकेरा गया है। इसमें विज्ञान, भविष्य की संभावनाओं और आत्मा से जुड़े काल्पनिक विचारों का प्रयोग कर कहानी को रोचक और भावना प्रधान बनाने का प्रयास किया गया है| 

 


कहानी - क्वांटम हाउस 

एक रिसर्च लेबोरेटरी में काम करने वाले वैज्ञानिक अलेक्जेंडर वर्मा अपने काम में इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें समय का पता ही नहीं चलता था। अक्सर कंपनी के गार्ड को उनके पास आकर कहना पड़ता था कि सर सभी लोग चले गए। क्या अभी भी काम करते रहेंगे? आदि आदि। ( गार्ड से उनको लगाव सा हो गया था)| 

 

सिकंदर वर्मा हंसकर उनका अभिवादन करते और फिर थोड़ी देर में चले जाते थे। और जब वह घर जाते तो उनकी पत्नी अमृत कौर और प्यारी सी 5 साल की बच्ची कशिश इंतजार करते-करते सो जाते।

 

वे बाइक से घर पहुंचते और घर का बेल बजाते तो अमृत कौर तुरंत उठकर दरवाजा खोलतीं। उनको वर्मा जी से कभी भी कोई शिकायत न रहती। वे बिल्कुल गंभीर किंतु सहज, सरल महिला थीं।

 

जब एक बार वर्मा जी ने अपनी पत्नी से कहा - तुम लोग मेरा इंतजार इतने अधिक समय तक क्यों करते हो। मैं माफी चाहता हूं देरी के लिए।

क्योंकि रिसर्च काम होता ही ऐसा है कि समय का पता नहीं चलता। इसलिए तुम लोग खाना खा लिया करो प्लीज।

 

इस पर उनकी पत्नी ने कहा कि हम लोग कैसे खा सकते हैं। कम से कम एक वक्त तो साथ में खाना खा लिया जाए।

 बड़े नसीब से पूरा परिवार एक साथ खाना खा पाता है। और इसमें जो खुशी मिलती है उसका आनंद ही कुछ और है।

 

वर्मा जी - तो कम से कम कशिश को तो खाना खिला दिया करो। वह तो अभी बहुत छोटी है।

 

कशिश ने सुनते ही कहा - पापा यह कैसे हो सकता है कि मैं खाना खा लूं और अपने पापा को भूखे रहने दूं। आपके बिना खाना खाना हमें थोड़ा भी अच्छा नहीं लगता।

 

वर्मा जी अपनी बच्ची से असीम प्रेम करते थे। प्रतिदिन वे सुबह पार्क में टहलने निकलते थे। एक दिन टहलने के बाद पार्क की कुर्सी पर बैठकर वे सोचने लगे कि क्या अपने परिवार से इतना प्रेम उचित है।

शायद नहीं। हम किसी से इतना प्रेम क्यों करें कि जुदाई पर बहुत तकलीफ हो।

 

परंतु वे अच्छी तरह जानते थे कि यह एक ऐसा भाव है जो हर व्यक्ति में अलग-अलग होता है।

 

उनके दिमाग में ये बातें चल रही थीं  कि अगर कहीं पत्नी या बच्ची को कुछ हो जाए तो फिर कैसे जीऊंगा।  वे इन्हीं ख्यालों में डूबे हुए थे कि अचानक पड़ोसी दिलावर सिंह उनके पास पहुंचे और उन्हें टहलने की बात कही। इसके बाद वे साथ साथ टहलने लगे।

 

 एक सबसे खास बात उनके परिवार में थी। और वो ये कि उनके पिताजी एंथनी डी सूजा क्रिश्चियन थे। उस नाते वे भी क्रिश्चियन थे। परंतु एंथनी बड़े ही खुले सोच के व्यक्ति थे।

 वे लक्ष्मी जी और गणेश जी की विशेष रूप से पूजा किया करते थे।

 

उन्होंने एक सिख महिला से विवाह किया था। जो बेहद ही शालीन महिला थी और उनकी बच्ची का नाम ‘कशिश’ इस शब्द की खासियत के चलते उन्होंने रखा था।

 

पारिवारिक जिम्मेदारियों को वे पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश करते। परंतु अक्सर अपनी पत्नी से कहते कि मुझे क्षमा करना ।

क्योंकि मैं पारिवारिक कर्तव्यों को पूरी तरह से नहीं निभा पा रहा हूं। और तुम सबको समय नहीं दे पा रहा हूं।

क्वांटम फिजिक्स” पर जो मैं काम कर रहा हूं, उससे शायद बहुत ही जल्द मुक्ति मिल जाए। क्योंकि यह बहुत ही गंभीर विषय है।

 

उनकी पत्नी ने पूछा ऐसा क्या खास है आपके क्वांटम फिजिक्स में जिसमें डूब कर आप अपनी पत्नी और बेटी तक को भूल जाते हैं।

 

उन्होंने कहा -  नहीं ऐसी बात नहीं है। मैं जब जो काम करता हूं, पूरी तरह से उसमें डूब जाता हूं। और क्योंकि वह अनुसंधान का विषय है और एक दिन का नहीं है।

इसलिए समय का पता नहीं चलता।

 

 यही कारण है कि मुझे अफसोस होता है कि तुम लोगों को समय कम से कम दे पाता हूं। परंतु मैं दिल से कहता हूं कि तुम दोनों से मुझे अगाध प्रेम है।

 

वर्मा जी जब भी छुट्टियां पाते, पत्नी व बच्ची के साथ बड़ी खुशी-खुशी घूमने चले जाते। अपनी पुत्री के साथ बच्चा बनकर ही खेलने लगते और पूरे उत्साह, उमंग व आनंद के साथ समय बीताते।

 

क्वांटम फिजिक्स पर रिसर्च के दौरान वह कुछ ऐसा खोज कर रहे थे जिससे वह भविष्य को देख सके। ज्यादा न सही तो कम से कम अपने भविष्य की (आने वाले) 30 मिनट की घटनाओं को तो अवश्य देख सकें।

 

धीरे-धीरे उन्होंने अपने घर में ही एक कमरा अपने अनुसंधान कार्य के लिए समर्पित कर दिया था। उस कमरे में वे घंटे काम किया करते।

 

उनकी पत्नी ने उनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए उस कमरे के बाहर एक बोर्ड लगवा दिया; जिस पर लिखवाया था - क्वांटम कैमरा।

वर्मा जी को भी यह नाम बड़ा अच्छा लगा।

 

एक दिन जब वे ऑफिस से लौटे तो घर के बाहर दीवार पर एक नया प्लेट देखा, जिस पर लिखा था -

A - 35, क्वांटम हाउस, बेंगलुरु।

 

यह देख कर वे हंस पड़े और उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि चलो अच्छा हुआ तुमने हमारे घर का भी नाम क्वांटम हाउस दे दिया।

 

अब मोहल्ले, पड़ोस के लोग भी जान गए कि इस घर का नाम क्वांटम हाउस है और वर्मा जी को क्वांटम मैन के नाम से पुकारा जाने लगा।

 

अपना रिसर्च काम करते हुए वे काफी हद तक आगे बढ़ गए।

एक बार जब उनकी पत्नी ने पूछा कि मैं तो आपके रिसर्च काम के बारे में नहीं जानती। मैं ठहरी साहित्य की दुनिया में बसने वाली। पर आप थोड़ा बहुत बतलाएं अपने क्वांटम फिजिक्स रिसर्च के बारे में।

 

इस बात पर वर्मा जी ने कहा - ‘क्वांटम' का साधारण मतलब 'सबसे छोटा हिस्सा' या 'निश्चित मात्रा' होता है।

​भौतिक विज्ञान में जब हम परमाणु और इलेक्ट्रॉनों जैसे अति सूक्ष्म कणों की दुनिया में जाते हैं, तो ऊर्जा और पदार्थ लगातार बहने की बजाय छोटे-छोटे टुकड़ों में व्यवहार करते हैं।  बस, इन्हीं सबसे छोटे, निश्चित मात्रा वाले टुकड़ों या अटूट टुकड़ों को क्वांटम (Quantum) कहा जाता है।

 

लेकिन “क्वांटम” हमेशा सबसे छोटा और अटूट टुकड़ा हो यह जरूरी नहीं है। जैसे- प्रकाश की ऊर्जा के एक क्वांटम को फोटॉन कहते हैं।

 

​फिर उन्होंने हंसते हुए कहा कि ढलान पर गेंद का लुढ़कना, जहां गति हर बिंदु पर लगातार बदलती है। तो इसे हम आमतौर पर सामान्य भौतिकी के रूप में लेते हैं।

 

 जबकि ​सीढ़ियां चढ़ना, जहां हम सीधे एक पायदान से दूसरे पर जा सकते हैं, बीच की हवा में रुक नहीं सकते। इसे हम क्वांटम फिजिक्स के रूप में देखते हैं।

 

परंतु सही अर्थों में देखा जाए तो क्वांटम दुनिया वास्तव में सीढ़ियों पर चलने जैसी नहीं है; यह केवल असतत ऊर्जा-स्तरों को समझाने की एक उपमा है।

 

इसके अलावा बहुत छोटे पैमाने पर प्रकृति का व्यवहार क्वांटम यांत्रिकी के नियमों द्वारा अधिक सही ढंग से वर्णित होता है।

 

गेंद का लुढ़कना भी अंततः पदार्थ के क्वांटम नियमों से ही जुड़ा है, लेकिन गेंद के स्तर पर हमें क्वांटम प्रभाव सामान्यतः दिखाई नहीं देते।

 

फिर उन्होंने आखिर में कहा कि जब बहुत छोटी चीज़ों की बात आती है, तो सामान्य भौतिकी के नियम काम करना बंद कर देते हैं और क्वांटम विज्ञान के नियम लागू होते हैं।

 

 

उनकी पत्नी ने कहा कि अच्छा ठीक है अब रहने दीजिए फिजिक्स की बातें।

 

फिर वे हंसते हुए कहती हैं -

आप ही समझें जनरल तथा क्वांटम फिजिक्स।

मैं तो जानती हूं इंग्लिश लिटरेचर व लिरिक्स।।

 

 

उनकी जिंदगी बहुत सुकून भरी चल रही थी। परंतु कुदरत को कुछ और ही मंजूर था।

 

उनकी पुत्री का जन्मदिन एक मार्च को था। सुबह स्कूल बस पर चढ़ते समय बच्ची बड़ी उत्सुकता से अपने पापा से कहती है- पापा आज जरूर घर शाम 7:00 बजे तक आ जाईएगा। भूलिएगा मत। अपने मोबाइल में डबल अलार्म भी लगा लीजिए।

 

मुस्कुराते हुए वर्मा जी कहते हैं - ज़रूर! मैं ज़रूर आ जाऊंगा। पक्का। उन्होंने अपनी बच्ची के सामने ही डबल अलार्म लगाया ताकि समय से 5 मिनट पहले वह घर पहुंच जाएं।

 

वर्मा जी अपने ऑफिस पहुंचे और अपने काम में अभी-अभी डूबे ही हुए थे कि अचानक उनके एक सहयोगी ने एक ऐसी बात आकर कही,जिसे सुनकर वे पागल सा हो गये।

 

दरअसल उनकी पुत्री जिस बस से स्कूल जा रही थी उसका एक्सीडेंट हो गया था और दुर्भाग्यवश कुछ बच्चे घायल हो गए थे और उन्ही घायल बच्चों में से एक उनकी पुत्री कशिश भी थी, जिसका देहांत हो चुका था।

 

जब वे अस्पताल पहुंचे तो देखा कि डॉक्टर भी बहुत भावुक थे। ऐसा इसलिए कि उनकी बच्ची के आखिरी शब्द बहुत दर्दनाक थे।

 

डॉक्टर ने कहा -  क्या आप ही इस बच्ची के पिता हैं।

वर्मा जी ने रोते हुए सिर हिलाया।

डॉक्टर ने कहा - आपकी बच्ची मरते हुए भी आप को याद कर रही थी और कह रही थी कि पापा जल्दी घर आ जाईएगा। आज मेरा जन्मदिन है।

 

वर्मा जी यह सब सुनकर वहीं गिर गये। वर्मा जी बिल्कुल टूट चुके थे। उनकी दुनिया खत्म हो चुकी थी। कुछ सहयोगियों के साथ अपनी मृत बच्ची को लेकर जब वे घर पहुंचे तो देखा की पत्नी जमीन पर गिरी हुई थीं और कई लोग उन्हें घेरे हुए थे। पूछने से पता चला कि वे अभी-अभी बेहोश हो गई हैं।

 

वे अपनी पत्नी को तत्काल अस्पताल ले गए। डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया और बताया कि उनकी कार्डियक अरेस्ट के कारण मृत्यु हो गई है।

 

अब वे एक साथ दो व्यक्ति का अंतिम संस्कार या यूं कहें कि वे अपने आप सहित अपनी पूरी दुनिया का अंतिम संस्कार कर रहे थे।

 

लोगों ने देखा कि वर्मा जी ने अपनी मृत पत्नी के बगल में उनकी पसंदीदा दो साहित्यिक पुस्तकें रखा था। क्योंकि वो साहित्य प्रेमी थीं। जबकि पुत्री के बगल में उसका प्यारा ट्रेन। और साथ ही उसका पसंदीदा गाजर का हलवा जो उनके अनुरोध पर एक पड़ोसन ने उनके घर पर ही बनाया था।

 

इन मृत्यु की घटनाओं का बहुत ज्यादा प्रभाव वर्मा जी पर पड़ा और वे अर्धमृत सा रहने लगे। जब भी वे अपने काम पर जाते, उनमें पहले जैसा उत्साह, ज़िंदादिली नहीं रह गई थी।

 

 वापस घर आने के बाद शायद ही वे कभी-कभी किसी से मिलते। बस अपने क्वांटम कमरे में करीब करीब सारा समय देते और रिसर्च करते रहते थे।

 

वे सोचते रहते कि काश वे भूतकाल में चले जाते तो कितना अच्छा होता। ऐसा होने पर वे अपनी बिटिया और पत्नी से एक बार मिल पाते।

 

वे अक्सर अकेले में भी अपनी मृत पत्नी या बच्ची से बातें किया करते थे।  तस्वीरें देखना और ये कहना कि तुम लोग मुझे छोड़कर क्यों चले गए। काश! उसी दिन मैं भी तुम दोनों के साथ चला जाता।

 

सामान्य दिनचर्या में भी वे अपनी मृत पुत्री कशिश के फोटो के सामने उसका प्यारा डिश गाजर का हलवा रख देते। फिर स्वयं एक प्लेट में लेकर थोड़ा-थोड़ा खाते। बाद में तस्वीर के सामने रखे हुए हलवे को बाहर ले जाकर किसी भी जानवर के सामने रख देते।

 

रिसर्च करते हुए उन्होंने अपने मिरर बॉल में कुछ ऐसा बनाया, जिसके माध्यम से सचमुच भविष्य में होने वाली घटनाओं को देखा जा सकता था। यह अनुसंधान उनके लिए एक चमत्कार से काम नहीं था। परंतु यह सीमा लगभग लगभग आधे घंटे की ही थी।

 

उन्होंने किसी को कुछ नहीं बताया और निरंतर इस पर काम करते रहे। भविष्य की 30 मिनट की घटनाओं को प्रत्यक्ष रूप से देख पाने का अनुसंधान उन्हें बहुत ज्यादा रोमांचित नहीं किया। क्योंकि भविष्य में जाने से भला पत्नी और बेटी से वे कैसे मिल सकते थे।

 

दरअसल आधे घंटे भविष्य को देख पाने की पुष्टि एक खास दिन हुई जब उनके पड़ोस में एक औरत बीमार पड़ी।

हुआ यूं कि एक दिन वे अपना अनुसंधान काम कर रहे थे। भविष्य में जाने की बात की पुष्टि के लिए वह अपने बौल मिरर के साथ कुछ कर रहे थे।

 

 तभी उन्होंने उस मिरर में एक घड़ी देखी, जिसमें रात के 10:00 बज रहे थे। उनका एक पड़ोसी अजय कुमार दौड़ते हुए आते हैं व बेल बजाते हैं।

 

 वर्मा जी दरवाजा खोलते हैं। वह कहते हैं कि वर्मा जी थोड़ी मदद चाहिए। पत्नी की तबीयत खराब है। बाहर एंबुलेंस खड़ी है। जल्दी हमारे साथ हॉस्पिटल चलिए।

 

वर्मा जी कहते हैं - हां अभी तुरंत चलता हूं। और यह कहकर वह अपना दरवाजा बंद करके उनके साथ अस्पताल चले जाते हैं।

 

वर्मा जी को नियर में यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि अब तक किसी ने बेल नहीं बजाया। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ पर यह मिरर में मैं क्या देख रहा हूं?  क्या सचमुच में  ये भविष्य की घटना तो नहीं है। क्या यह सच होगा? पर वे नेगलेक्ट करके अपना आगे काम करने लगते हैं।

 

 परंतु ठीक आधे घंटे के बाद वही होता है जो उन्होंने अपने मिरर में देखा था और हू ब हू वो सब कुछ हुआ।

 

वे अस्पताल गए। उनके पड़ोसी की पत्नी को हार्ट अटैक आया था। अस्पताल में जो कुछ बन पड़ा, उन्होंने किया व एक अच्छे पड़ोसी का धर्म निभाया।

 

हालांकि अस्पताल में उनके होश उड़े हुए थे। उन्होंने अपनी पड़ोसी की मदद तो की परंतु उन्हें अपने भविष्य को देखने की सफलता पर और शोध करने की प्रेरणा मिली।

 

अस्पताल में उनके पड़ोसी ने उन्हें बहुत धन्यवाद दिया ।

वर्मा जी ने उनसे कहा - अजय जी, कुछ चीजों को मैं बयान नहीं कर सकता। हालांकि इतना अवश्य कहूंगा कि आपके यहां घटी इस घटना को मैंने अपने रिसर्च मिरर के माध्यम से आपके बेल बजाने से आधे घंटे पहले ही जान लिया था। यूं कहूं तो पहले ही देख भी लिया था।

 

 आगे वे कहते हैं कि इस बारे में मैं फिर कभी चर्चा करूंगा। वर्मा जी ने अजय जी को हाथ जोड़कर कहा - अजय जी, जिंदगी का क्या भरोसा?

 

आज हम साथ में हैं। हो सकता है कल न मिले।यही तो ज़िंदगी है। पर जब तक सांस है और हम जीवित हैं तब तक जब भी मिलें, प्रेम से मिलें, खुशी से मिलें।

 

बस यही तो जिंदगी है। मैं व्यक्तिगत बात करूं तो मुझे जीने की कोई इच्छा नहीं। मेरा बस चले तो अपने पुत्री से सदा सदा के लिए मिल जाऊं। यह कह कर वे रोने लगते हैं।

 

उनके पड़ोसी अजय जी उनसे लिपट जाते हैं।  दोनों एक दूसरे को हिम्मत बंधाते हैं और थोड़ी देर के बाद वर्मा जी अपने घर चले जाते हैं।

 

और फिर एक दिन वर्मा जी अपने ऑफिस नहीं जाते हैं। ईमेल पर एप्लीकेशन देते हैं कि आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।….. एप्लीकेशन भेजने के बाद वे अपने रिसर्च पर लग जाते हैं।

 

वह सबसे ज्यादा उस दिन व्यथित थे। पूरे दिन अपनी पत्नी और बच्ची को उन्होंने याद किया। वे बेटी को गोद में उठाने, लिपटने के लिए बहुत ज्यादा तड़प महसूस कर रहे थे।

 

शाम का समय। वह अपने मिरर पर काम कर रहे थे। वे सोच रहे थे कि जिस प्रक्रिया का मैंने पालन किया, उसके तहत तो भविष्य में आधे घंटे के लिए आवश्य जाया जा सकता है। परंतु इसका और  किस प्रकार प्रयोग किया जाए कि मैं अपनी पत्नी या पुत्री को भी देख सकूं।

 

इन्ही ख़यालों में वे डूबे हुए थे कि काश उस दिन मैं भी साथ चला जाता अपने दोनों प्रिय जनों के साथ। अब ज़िंदगी ज़िंदगी नहीं रही।

 

आगे वे मिरर पर अपना काम करने लगे। अब शाम के ठीक 7:25 बजे थे। काम के दौरान अचानक उन्होंने मिरर में देखा कि एक नीले रंग की ड्रेस पहनी हुई एक छोटी बच्ची है। वह बच्ची कोई और नहीं उनकी पुत्री कशिश थी।

 

वह कहती है - पापा मैं दरवाजे के बाहर खड़ी हूं। आपने मुझे बहुत समय से याद किया है। आपसे बिछड़े हुए 1 साल हो गए। इस 1 साल मैंने बहुत तकलीफ से बिताया है। पर क्या करूं? आपसे सदा के लिए मिल भी तो नहीं सकती।

 

उस मिरर में आगे देखते हैं कि वे दरवाजा खोलते हैं। सामने गेट पर उनकी बेटी दिखती है।

वर्मा जी अभी इतना ही कहते हैं - आओ बेटी, कि उनकी बेटी बिना गेट खोलें अपने आप अंदर प्रवेश कर जाती है।

वह अंदर तो आई परंतु करीब उनसे 1 मीटर दूरी पर खड़ी रहती है। वह रोती रहती है। अपनी पत्नी को देखकर वर्मा जी भी पूरी तरह से फूट-फूट कर रो रहे थे।

 वर्मा जी बोलते हैं- क्या मैं सच में तुम्हें देख रहा हूं? यह मैं क्या कोई सपना देख रहा हूं।

 

 बेटी रूआंसे अंदाज में कहती है - नहीं पापा! आप सच में मुझे देख रहे हैं।

 

 वर्मा जी - फिर तुम हमेशा के लिए मेरे पास क्यों नहीं चली आती। क्या ऐसा नहीं हो सकता?

 

कशिश -  पापा! मैं आपसे गले मिलना चाहती हूं। पर मिलूं कैसे? आपकी दुनिया और मेरी दुनिया बिल्कुल अलग है पापा। आपने देखा नहीं कि आपके बिना गेट खोले ही मैंने अंदर प्रवेश कर लिया। क्योंकि मैं बहुत ही व्यग्र थी।

 

आगे कशिश रहती है-  मैं तो आपके बिना दरवाजा खोलें भी अंदर आ सकती थी। परंतु बिना आपकी अनुमति के अंदर नहीं आना चाहती थी।

 

वर्मा जी कहते हैं - लेकिन पुत्री! तुम तो मेरे अंदर हमेशा रहती हो। बस तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से देख नहीं पाता था। पर आज देख रहा हूं।

 

कशिश - हां पापा! अपने सदा मुझे याद किया है। इस नाते मैं भी कभी आपको भूल ही नहीं पाई।

 

कुछ देर तक दोनों चुप रहते हैं। इसके बाद कशिश कहती है - पापा! आपने मुझे याद किया है। इसलिए मुझे आना ही पड़ा। क्योंकि मैं भी आपसे असीम प्रेम करती हूं। अब मैंने आपको देख लिया और आपने भी मुझे देख लिया। इसलिए मैं जा रही हूं।

 

 आप मुझे इतना याद मत कीजिए कि मुझे अपनी दुनिया छोड़कर यहां आना पड़े। मेरे आने से भी तो आपको बहुत तकलीफ हो रही है। क्योंकि मैं आकर भी आपसे नहीं मिल सकती और आप मुझे प्रेम नहीं कर सकते।

 

पापा! मैं आपसे आग्रह करती हूं कि आगे आप इतना अधिक व्यथित नहीं होंगे, इतना अधिक नहीं तड़पेंगे।

 

वर्मा जी कहते हैं -  बेटी! मैं भी तुम्हारी दुनिया में तुम्हारे साथ अभी जाना चाहता हूं।

इस पर कशिश रोते हुए कहती है - नहीं पापा! यह आप क्या कह रहे हैं? आप अभी इस दुनिया में हैं। मैं आपके बारे में ऐसा सोच भी नहीं सकती।

 

 वर्मा जी - अब मुझे इस दुनिया से कोई काम नहीं।

मैं तुम दोनों के बिना पल भर भी जीना नहीं चाहता। एक दिन हजारों बरस के बराबर है। मैं तुम्हारे साथ चलना चाहता हूं तुम्हारी दुनिया में।

 

 फिर तुरंत वे  पूछते हैं -  क्या तुम अपनी मम्मी से भी मिल पाती हो?

 

कशिश सिर हिलाकर हामी भर्ती है।

 

फिर वे कहते हैं - बस, मुझे अब इस दुनिया में नहीं रहना। बहुत जी लिया इस जग में। बेटी! अगर मैं तुम्हारा पिता हूं तो मेरा एक कहना सिर्फ कर दो। बस तुम अपने साथ मुझे ले चलो।

 

अगर तुम सच में मुझसे प्रेम करती हो तो मुझे अपने साथ ले चलो। यह मेरा तुमसे आखिरी अनुरोध है, आज्ञा है, निर्देश है और सब कुछ है।

 

कशिश थोड़ी मुस्कुरा कर हामी भरती है।

 

तभी वर्मा जी कहते हैं - हां एक काम मैं कर दूं। इस मिरर का यूं ही रहना अच्छा नहीं। भविष्य में लोगों के जीवन में यह बहुत संकट पैदा कर सकता है। इसलिए इसे खत्म करना होगा।

 

यह कह कर वे एक बटन दबाते हैं और मिरर में एक पतली सी दरार आ जाती है।

 

उसके बाद कशिश पिता की तरफ आगे बढ़ते हुए उनके शरीर में समा जाती है और वर्मा जी धीरे-धीरे मिरर की तरफ आगे बढ़ते हैं और मिरर में समाकर विलिन जाते हैं।

 

वर्मा जी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और बड़ा सुकून भी। उन्होंने अपने आप से कहा कि नि:संदेह यह सत्य होगा। क्योंकि जब पड़ोसी की बात सच हुई तो यह क्यों नहीं होगा। यह सोचकर फिर वे पुराने दिनों के खयालों में कुछ देर के लिए डूब जाते हैं। तभी अचानक बाहर बेल बजता है।

 

उन्होंने घड़ी देखा 7:25 हो रहे थे। उन्हें समझ में आ गया कि उनके द्वारा देखा गया मिरर में सपना समान सच अब निश्चित ही सत्य साबित होगा।

 

 वह दौड़ कर अपने क्वांटम कमरे से दरवाजे की ओर निकलते हैं और दरवाजा खोलते हैं।

 

सामने उनकी बच्ची कशिश खड़ी थी रो रही थी। वर्मा जी भी काफी उत्साहित थे और रो भी रहे थे। और फिर वे सारी बातें घटित होती हैं जो उन्होंने मिरर में देखा था । और इस प्रकार वे अपनी मृत पुत्री कशिश के साथ सदा के लिए इस दुनिया को छोड़कर चले जाते हैं।

 

अगले दिन सुबह 4:00 बजे वर्मा जी का दरवाजा खुला देखकर मोहल्ले के एक व्यक्ति को ताज्जुब हुआ कि वर्मा जी आज इतना सुबह-सुबह कैसे उठ गये और उन्होंने अपना दरवाजा खोलकर क्यों रखा है।

 

उस पड़ोसी ने वर्मा जी के पड़ोसी मित्र अजय जी को जगाया और फिर कुछ और लोगों के साथ उनके घर के सामने आकर उन्हें लगातार आवाज दी।

 

 प्रति उत्तर में जब काफी देर तक कोई जवाब नहीं मिला तो वे सभी अंदर प्रवेश कर गए। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए पांच कमरों में से आखरी कैमरा के पास वे पहुंचे,  जिसके ऊपर लिखा हुआ था - क्वांटम रूम।

 

जब सभी उसमें प्रवेश करते हैं तो बहुत सारे प्रयोग की चीजें पाई जाती हैं। वहां एक हल्का दरार वाला मिरर दिखाई दिया, जिसमें लिखा हुआ था-

किसी भी इंसान को किसी से इतना प्रेम नहीं करना चाहिए कि उसके बिना वह जी ना सके। और अगर सच में ऐसा है तो उसे अपने दिल की बात माननी चाहिए। और मैंने भी ऐसा किया।

अलविदा दोस्तों, अलविदा!

 

विजय जी सब कुछ समझ गए कि यह वही मिरर है जिसके माध्यम से वर्मा जी वे बातें जान चुके थे, जिनकी चर्चा उन्होंने अस्पताल में की थी और निसंदेह वह अपनी पुत्री के साथ हमेशा के लिए चले गए।

 

भविष्य में वर्मा जी कहीं भी दिखाई नहीं दिए। पुलिस द्वारा भी काफी छानबीन की गई। बरसों बरस बीत गए, परंतु उनका अंततः कहीं पता नहीं चला। और पुलिस ने इस गुमशुदगी  की फाइल को सदा के लिए बंद कर दिया।

 

शायरी

 

न कर प्यार किसी से हद से ज्यादा,

कि उसके बिन ज़िंदगी जी न सको।

न कर प्यार किसी से हद से ज्यादा,

कि उसके बिन ज़िंदगी जी न सको।

पीना पड़े जहां का यदि तुम्हें ज़हर,

तो बिल्कुल उसे तुम पी न सको।

 गर फट जाए कभी ज़िंदगी की चादर,

तो उसे तुम तनिक भी सी न सको।

तो उसे तुम तनिक भी सी न सको।

 

(ईश्वर करे ऐसे हालत किसी के साथ न आए)।

            लेखक-  कृष्ण कुमार कैवल्य।

 

 

Quantum House | विज्ञान और आत्मा की रहस्मयी कहानी  से सम्बंधित शब्दार्थ/भावार्थ- 

 

 सुकून - चैन, आराम|

कशिश -दिलकशी, आकर्षण|


 

 

 ☕ साहित्य सेवा में सहयोग दें 🖋️

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ